नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में काले धन के प्रयोग पर गहरी चिंता जताते हुए इसे निष्पक्ष चुनावों और कानून के शासन के लिए बड़ा खतरा बताया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब मतदाताओं का निर्णय बाहरी धनबल या प्रलोभन से प्रभावित होता है, तो वह स्वतंत्र जनादेश न होकर किसी अन्य की मंशा को थोपने जैसा हो जाता है। न्यायालय ने चुनावों के दौरान जब्त की गई गैर-कानूनी राशि और दर्ज आपराधिक मामलों की त्वरित जांच व शीघ्र निस्तारण के लिए कई कड़े दिशानिर्देश भी जारी किए हैं।
लोकतंत्रीय प्रक्रिया पर बाहरी प्रभाव का खतरा
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 2015 के एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि हर नागरिक का मत देश की नीतियों को दिशा देता है। यदि यह प्रक्रिया ही अवांछित धनबल से दूषित हो जाए, तो जनता के शासन की मूल अवधारणा प्रभावित होती है। अदालत ने माना कि चुनावों में अवैध धन का अवैध लेन-देन निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाता है और इसे रोकना चुनाव आयोग सहित सभी संबंधित संस्थाओं का प्रमुख दायित्व है।
जांच प्रक्रियाओं और समय-सीमा के लिए कड़े निर्देश
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब भी चुनाव के दौरान कोई संदिग्ध नकदी या संपत्ति जब्त की जाए, तो सक्षम प्राधिकरण को 24 घंटे के भीतर संबंधित अदालत या जिला मजिस्ट्रेट को इसकी लिखित सूचना देनी होगी। इसके साथ ही, मामले में दर्ज प्राथमिकी की जांच को एक वर्ष के भीतर पूरा करने के प्रयास किए जाने चाहिए। यदि जांच में अधिक समय लगता है, तो उसके कारणों को दर्ज कर संबंधित नोडल अधिकारी के माध्यम से विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
विशेष अदालतों में मामलों के त्वरित निस्तारण पर जोर
अदालत ने लंबित मामलों की भारी संख्या पर ध्यान आकर्षित करते हुए राज्यों के उच्च न्यायालयों को विशेष अदालतों के गठन का सुझाव दिया है, ताकि जनप्रतिनिधियों और उम्मीदवारों से जुड़े मामलों की त्वरित सुनवाई हो सके। इसके अतिरिक्त, यदि जांच के दौरान 10 लाख रुपये से अधिक की बेनामी नकदी पाई जाती है, तो इसकी सूचना तुरंत आयकर विभाग को देने के निर्देश दिए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी संबंधित पक्षों को इन सुधारत्मक निर्देशों के पालन की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।

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