October 6, 2026

त्विषा शर्मा केस: डिफॉल्ट बेल की मांग खारिज, कोर्ट ने CBI की चार्जशीट को माना अहम

भोपाल: बहुचर्चित त्विषा शर्मा की संदेहास्पद मौत के मामले में मुख्य आरोपी समर्थ सिंह को भोपाल जिला एवं सत्र न्यायालय से डिफॉल्ट बेल (डिफॉल्ट जमानत) का लाभ नहीं मिल सका है। सोमवार को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शोभना भलावे ने आरोपी समर्थ सिंह की तरफ से दाखिल की गई डिफॉल्ट जमानत याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के आधिकारिक आदेश के अनुसार, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने निर्धारित 90 दिनों की कानूनी अवधि के भीतर ही अदालत में अपना चालान पेश कर दिया था। सीबीआई ने गत 17 अगस्त को ही चालान दाखिल कर दिया था और संबंधित अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) कोर्ट इस पर संज्ञान भी ले चुकी है। आरोपी समर्थ सिंह को 23 मई 2026 को गिरफ्तार किया गया था, और इस प्रकार गिरफ्तारी के 90 दिन पूरे होने की समयसीमा समाप्त होने से पहले ही चालान विधिवत रूप से पेश कर दिया गया था।

मृतका के माता-पिता के वकीलों ने किया जमानत याचिका का कड़ा विरोध

अदालत में सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रिम कोर्ट) के एक पुराने फैसले का हवाला दिया गया। जांच एजेंसी ने तर्क दिया कि जब एक बार जांच एजेंसी द्वारा निर्धारित समय में चालान पेश कर दिया जाता है और अदालत उस पर संज्ञान ले लेती है, तो केवल इस आधार पर चालान को अधूरा नहीं माना जा सकता कि कुछ दस्तावेज बाद में दाखिल होने हैं या किसी अन्य सह-आरोपी के खिलाफ अभी भी जांच जारी है। सीबीआई का पक्ष था कि यदि चालान के साथ कुछ कागजात या दस्तावेज तुरंत रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं भी हैं, तो भी मूल चालान अमान्य नहीं हो जाता। एक बार अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद आरोपी के पास वैधानिक रूप से डिफॉल्ट बेल का अधिकार समाप्त हो जाता है।

मृतका त्विषा शर्मा के माता-पिता की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अंकुर पांडे ने भी आरोपी की डिफॉल्ट बेल का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया कि सीबीआई ने कानून के मुताबिक निर्धारित 90 दिन की समयावधि के भीतर ही चार्जशीट दाखिल कर दी थी और अदालत ने उस पर संज्ञान भी ले लिया है, इसलिए आरोपी को इस आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

बचाव पक्ष और आरोपी समर्थ सिंह की ओर से क्या दी गई दलीलें?

दूसरी ओर, आरोपी समर्थ सिंह की तरफ से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अजय गुप्ता ने अपनी दलील रखते हुए कहा कि भले ही सीबीआई ने एक कागजी चालान पेश कर दिया हो, लेकिन इस मामले में जांच को जानबूझकर अधूरा रखा गया है, ताकि किसी भी तरह से आरोपी को वैधानिक जमानत का लाभ न मिल सके। बचाव पक्ष का यह तर्क था कि चूंकि जांच अभी भी पूरी नहीं हुई है, इसलिए समर्थ सिंह को डिफॉल्ट बेल का कानूनी लाभ मिलना चाहिए।

बचाव पक्ष के वकीलों ने यह भी तर्क दिया कि 17 अगस्त को सीबीआई द्वारा जो रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी गई थी, वह अंतिम और पूर्ण जांच रिपोर्ट नहीं थी, क्योंकि मामले की तहकीकात अभी भी जारी है। इसी मुख्य बिंदु का हवाला देते हुए 90 दिनों के भीतर वैधानिक जांच पूरी न होने का दावा किया गया था और अदालत से डिफॉल्ट जमानत दिए जाने की मांग की गई थी, जिसे अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद खारिज कर दिया।