नई दिल्ली। अधिकांश निवेशक एक बेहद सुव्यवस्थित रणनीति के साथ म्यूचुअल फंड में अपने निवेश का सफर शुरू करते हैं। वे सबसे पहले एक सामान्य सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) चुनते हैं, फिर टैक्स में छूट पाने के लिए एक टैक्स सेवर फंड जोड़ते हैं। इसके बाद स्मॉल-कैप की चर्चा सुनकर एक और स्कीम ले लेते हैं और इंटरनेट पर आकर्षक रिटर्न देखकर सेक्टोरल या मिड-कैप फंड्स में भी पैसा लगा देते हैं। कुछ समय बाद उन्हें पता चलता है कि वे बिना किसी ठोस रणनीति के हर महीने 8 से 15 अलग-अलग फंड्स में निवेश कर रहे हैं, जिनमें से ज्यादातर में एक ही जैसी कंपनियों के शेयर शामिल होते हैं। यहीं से पोर्टफोलियो में जरूरत से ज्यादा दोहराव (ओवर-डाइवर्सिफिकेशन) की समस्या जन्म लेती है।
संतुलित और फोकस्ड पोर्टफोलियो का महत्व
वित्तीय सलाहकारों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति एसआईपी के माध्यम से हर महीने लगभग 25,000 रुपये का निवेश कर रहा है, तो उसका लक्ष्य केवल फंड्स की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। मुख्य उद्देश्य एक ऐसा केंद्रित और सुगठित पोर्टफोलियो तैयार करना है जो जोखिम को तो कम करे, लेकिन साथ ही जिसे आसानी से ट्रैक और मैनेज भी किया जा सके। एक निश्चित सीमा के बाद पोर्टफोलियो में नई योजनाएं शामिल करने से न तो रिस्क मैनेजमेंट में कोई खास सुधार होता है और न ही मुनाफे में बढ़ोतरी होती है, बल्कि इससे केवल भ्रम और अव्यवस्था पैदा होती है।
अत्यधिक विविधीकरण से घटती है प्रदर्शन की ताकत
पोर्टफोलियो में बहुत ज्यादा फंड्स रखने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली स्कीम्स का मुनाफा भी दब जाता है। जब 25,000 रुपये की कुल राशि को 10 या 12 अलग-अलग जगहों पर बांट दिया जाता है, तो प्रत्येक फंड में लगने वाली पूंजी बेहद मामूली रह जाती है। ऐसी स्थिति में यदि कोई एक फंड असाधारण रिटर्न भी कमा कर दे, तो कुल निवेश पर उसका सकारात्मक प्रभाव बहुत कम दिखता है। इसके अलावा, इतने बड़े पोर्टफोलियो की समय-समय पर समीक्षा करना निवेशकों के लिए एक सिरदर्द बन जाता है, जिसके कारण वे बाजार के उतार-चढ़ाव को देखकर बिना सोचे-समझे इमोशनल फैसले लेने लगते हैं।
डाइवर्सिफिकेशन और इसके अतिरेक में बुनियादी अंतर
निवेश में जोखिम को कम करने के लिए डाइवर्सिफिकेशन बेहद जरूरी है ताकि किसी एक क्षेत्र या कंपनी पर निर्भरता न रहे। हालांकि, ओवर-डाइवर्सिफिकेशन की स्थिति तब आती है जब नए फंड्स जोड़ने से पोर्टफोलियो को कोई सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि केवल निवेश का दोहराव होने लगता है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि बारिश में एक साथ कई छाते लेकर चलने से कोई अतिरिक्त सुरक्षा नहीं मिलती, केवल बोझ बढ़ता है। म्यूचुअल फंड में भी ठीक ऐसा ही होता है; योजनाओं की संख्या बढ़ा देने मात्र से आपका पैसा अधिक सुरक्षित या अधिक लाभदायक नहीं हो जाता।

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