क्या जानते हैं? भगवान शिव को ‘महादेव’ नाम यहीं मिला था, गोकर्णेश्वर से जुड़ा है खास रहस्य

वाराणसी| भगवान शिव को 'महादेव' का संबोधन और नाम त्रिलोचन घाट के पास ही प्राप्त हुआ था। आध्यात्मिक नगरी काशी के कण-कण में शिव का वास है, जिसका प्रमाण स्वयं स्कंद पुराण का 'काशी खंड' देता है। इस ग्रंथ के अनुसार, काशी क्षेत्र में छोटे-बड़े कुल 27 करोड़ शिवलिंग मौजूद हैं। इनमें से अकेले पावन गंगा नदी में ही पांच करोड़ शिवलिंग समाहित हैं, जो कई बार जल में अदृश्य रहते हैं तो कई बार दर्शन देते हैं। काशी का प्रत्येक शिवालय आदि विश्वेश्वर बाबा विश्वनाथ के ही स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।

स्कंद पुराण के काशी खंड में इस बात का भी विशेष उल्लेख है कि स्वयं भगवान शिव कहते हैं कि हर एक शिवलिंग में मेरा ही स्वरूप समाया हुआ है। चाहे अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पानी हो या जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करना हो, काशी में ऐसे हजारों पापनाशक शिवलिंगों की अद्भुत मान्यता है। उदाहरण के लिए, कोदई चौकी क्षेत्र में स्थित गोकर्णेश्वर महादेव को बाबा विश्वनाथ का संदेशवाहक या पीआरओ (PRO) भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ की हर बात वे सीधे बाबा विश्वनाथ के कानों तक पहुँचाते हैं। इसके विपरीत, जमीन से करीब 40 फीट पाताल में स्थित पितामहेश्वर महादेव मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार केवल महाशिवरात्रि के पवित्र अवसर पर ही खुलते हैं।

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष नागेंद्र पांडेय के अनुसार, काशी खंड में यहाँ के शिवालयों के अलावा छप्पन विनायक, विभिन्न योगिनियों और प्राचीन देवी मंदिरों का भी विस्तृत वर्णन मिलता है। इस नगरी में भगवान श्रीराम, सूर्य देव, चंद्रमा समेत कई प्रमुख देवी-देवताओं और महान ऋषि-मुनियों ने भी अपने हाथों से शिवलिंगों की स्थापना की है। सनातन रक्षक दल के पदाधिकारियों के अनुसार भी 27 करोड़ शिवलिंगों में से कुछ दृश्य और कुछ अदृश्य रूप में यहाँ विद्यमान हैं। काशी के घरों से लेकर प्राचीन गलियों की दीवारों तक पर शिवलिंगों के दर्शन हो जाते हैं। दुनिया के किसी भी अन्य शहर में इतने अधिक देवगण एक साथ विराजमान नहीं हैं।

काशी के प्रमुख द्वादश (12) शिवलिंग

  • काशी विश्वनाथ (विश्वेश्वर)

  • सोमेश्वर (मान मंदिर घाट)

  • मल्लिकार्जुन या त्रिपुरांतकेश्वर (सिगरा क्षेत्र)

  • महाकालेश्वर (दारानगर, महामृत्युंजय मंदिर परिसर)

  • ओंकारेश्वर (मछोदरी)

  • वैद्यनाथ (बैजनत्था, कमछा)

  • भीमाशंकर या भीमेश्वर (काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के पास)

  • रामेश्वरम् (मान मंदिर घाट)

  • नागेश्वर (पठानी टोला, भैरवनाथ)

  • त्र्यंबकेश्वर (बांसफाटक की गलियाँ)

  • केदारनाथ या गौरी केदारेश्वर (केदार घाट)

  • घृष्णेश्वर या घृणेश्वर (कज्जाकपुरा)

काशी में स्थित नवग्रहों के विशेष शिवलिंग

  • सूर्य देव: गभस्तीश्वर (मंगलागौरी मंदिर के पास)

  • चंद्रमा: चंद्रेश्वर (सिद्धेश्वरी मोहल्ला)

  • शुक्र ग्रह: शुक्रेश्वर (कालिका गली)

  • शनि देव: शनैशचरेश्वर (काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर)

  • मंगल ग्रह: अंगारेश्वर या मंगलेश्वर (सिंधिया घाट क्षेत्र)

  • बुध, बृहस्पति, राहु और केतु: क्रमशः बुधेश्वर, बृहस्पतिश्वर, राहीश्वर और केतविश्वर के रूप में अपने-अपने स्थानों पर विराजमान हैं।

देवताओं और संतों द्वारा स्थापित पाँच प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर

  1. शंखचूड़ेश्वर महादेव: नागलोक के राजकुमार के रूप में प्रसिद्ध शंखचूड़ेश्वर महादेव का यह प्राचीन मंदिर दारानगर क्षेत्र में स्थित है। इसकी स्थापना शंखचूड़ द्वारा की गई थी। सावन और नागपंचमी के पावन पर्व पर यहाँ दर्शन-पूजन के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से भय, अकाल मृत्यु और कालसर्प दोष जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इसी मंदिर के समीप मंदाकिनी कुंड और माता आशापुरी का भी धाम है।

  2. प्रह्लादेश्वर महादेव (भक्त प्रह्लाद को समर्पित): प्रह्लाद घाट पर स्थित यह प्राचीन मंदिर स्वयंभू शिवलिंग है। ऐसी मान्यता है कि भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर ही प्रह्लादेश्वर महादेव यहाँ प्रकट हुए थे। इस मंदिर परिसर में प्रह्लाद केशव, भगवान विष्णु, माता शीतला, ईशानेश्वर शिव, जगन्नाथ और नृसिंह भगवान के विग्रह भी स्थापित हैं।

  3. उदलकेश्वर महादेव: राज मंदिर क्षेत्र में स्थित उदलकेश्वर (या उदलेश्वर) महादेव की स्थापना महर्षि उदालक ने की थी। पौराणिक ग्रंथों में इस क्षेत्र को विशेष तीर्थ यात्रा मार्ग माना गया है। यहाँ विधि-विधान से पूजा-पाठ करने से भक्तों को भगवान शिव की विशेष कृपा और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

  4. कामेश्वर महादेव (महर्षि दुर्वासा द्वारा स्थापित): मछोदरी क्षेत्र के रवींद्रनाथ टैगोर मार्ग पर स्थित इस मंदिर की स्थापना महर्षि दुर्वासा ने की थी। सच्चे मन से यहाँ पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और समस्त पापों का नाश होता है।

  5. गभस्तीश्वर महादेव (सूर्य देव की तपस्या का स्थल): पंचगंगा घाट के पास मंगला गौरी मंदिर परिसर में स्थित यह मंदिर सूर्य देव द्वारा स्थापित माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव ने यहीं कड़ी तपस्या कर शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त किया था, जिसके बाद इस शिवलिंग का नाम गभस्तीश्वर पड़ा।

विशेष कथाओं और रहस्यों से जुड़े अन्य प्राचीन शिवालय

  • कलशेश्वर महादेव: सिद्धेश्वरी गली में स्थित इस मंदिर का संबंध समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत कलश से माना जाता है। यहाँ पूजन करने से काल का भय समाप्त होता है।

  • कुक्कुटेश्वर महादेव: आत्मविरेश्वर मंदिर परिसर में स्थित यह शिव का एक दुर्लभ रूप है। शिवगण 'कुक्कुट' द्वारा स्थापित इस शिवलिंग के पूजन से व्यापार में वृद्धि और सफलता मिलती है।

  • आदि महादेव: मछोदरी क्षेत्र में त्रिलोचन महादेव मंदिर के पीछे स्थित यह काशी का प्रथम स्वयंभू और मूल स्रोत वाला शिवलिंग है, यहीं शिव को पहली बार 'महादेव' पुकारा गया था।

  • वृद्धकालेश्वर महादेव: महामृत्युंजय मंदिर परिसर में स्थित यह शिवलिंग उज्जैन के महाकालेश्वर का ही स्वरूप माना जाता है, जिनके पूजन से गंभीर रोगों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।

  • काशी के ओंकारेश्वर महादेव: पठानी टोला के ऊंचे टीले पर स्थित यह गुप्त और पौराणिक ओंकार क्षेत्र है, जिसके दर्शन से संपूर्ण काशी के तीर्थों का फल मिलता है।

  • त्रिशंधेश्वर महादेव: श्रीकाशी विश्वनाथ धाम परिसर में गंगा द्वार के पास स्थित यह मंदिर उन श्रद्धालुओं के लिए विशेष है जो नियमित संध्या वंदन नहीं कर पाते।

  • चंद्रेश्वर महादेव और चंद्रकूप: सिद्धेश्वरी मोहल्ले में स्थित इस चमत्कारी कूप और मंदिर में चंद्रमा ने तपस्या की थी। मान्यता है कि इस कूप की जलराशि में जिसकी परछाई साफ दिख जाए, उसकी आयु लंबी होती है।

  • गोकर्णेश्वर महादेव: कोदई चौकी क्षेत्र में स्थित इस शिवलिंग को भगवान विश्वनाथ का 'कान' माना जाता है, जिनके माध्यम से भक्तों की प्रार्थना सीधे विश्वनाथ तक पहुँचती है।

  • पितामहेश्वर महादेव (40 फीट पाताल में): चौक क्षेत्र की शीतला गली में जमीन से 40 फीट नीचे स्थित यह स्वयंभू मंदिर साल में केवल महाशिवरात्रि पर खुलता है, जहाँ सड़क के सुराख से जल चढ़ाया जाता है। इसके दर्शन से पितृ दोष समाप्त होता है।

  • मध्यमेश्वर महादेव: महामृत्युंजय मार्ग के पास स्थित यह स्वयंभू शिवलिंग काशी क्षेत्र का नाभि केंद्र है, जिससे पूरी काशी की पाँच कोस सीमा तय होती है।

  • ईशानेश्वर महादेव: बांसफाटक क्षेत्र में स्थित यह मंदिर भगवान शिव के ईशान (ज्ञान) रूप और ज्ञान-ध्यान की ऊर्जा का प्रतीक है।

  • संगमेश्वर महादेव: वरुणा-गंगा संगम (आदिकेशव घाट) और अस्सी-गंगा संगम (अस्सी घाट) पर स्थित ये दो प्राचीन शिवालय तीर्थ स्नान और तर्पण के समान पुण्य प्रदान करते हैं।

  • अमृतेश्वर महादेव: नीलकंठ इलाके में कॉरिडोर निर्माण के दौरान जमीन से 30 फीट नीचे मिले इस प्राचीन मंदिर को 14 शक्तिशाली शिवलिंगों में प्रथम स्थान प्राप्त है।

  • अग्निश्वर महादेव: भोसला घाट क्षेत्र में अग्नि तत्व के स्वामी शिव को समर्पित इस शिवलिंग के दर्शन से आग या बिजली के किसी भी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।