मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के खतौली क्षेत्र में घटित एक अत्यंत संवेदनशील और खौफनाक मामले में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए छह साल की मासूम भतीजी के साथ दुष्कर्म करने वाले दोषी दिव्यांग चाचा को शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए सश्रम आजीवन कारावास की कठोर सजा सुनाई है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय/विशेष न्यायालय (पॉक्सो अधिनियम) संख्या-1 की पीठासीन अधिकारी मंजुला भालोटिया ने अपने इस ऐतिहासिक निर्णय में सख्त टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह जघन्य कृत्य मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह से झकझोर देने वाला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मासूम के साथ किया गया ऐसा अपराध केवल किसी शरीर के विरुद्ध नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समाज की आत्मा पर प्रहार है, इसलिए आरोपी की शारीरिक दिव्यांगता या उसकी पारिवारिक स्थिति को किसी भी सूरत में क्षमा का आधार नहीं माना जा सकता।
दस नवंबर दो हजार चौबीस को अंजाम दी गई थी घिनौनी वारदात
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार यह सनसनीखेज वारदात 10 नवंबर 2024 को घटी थी, जब सुबह करीब दस बजे मासूम बच्ची को उसका पड़ोसी रिश्ते का चाचा बहला-फुसलाकर और हाथ पकड़कर अपने घेर में ले गया तथा उसके साथ दुष्कर्म की घिनौनी वारदात को अंजाम दिया। मजदूरी करने गए माता-पिता को जब इस घटना की जानकारी मिली, तो उन्होंने तत्काल खतौली पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया और विवेचना पूरी कर अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। केस की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सात और बचाव पक्ष की तरफ से दो गवाहों के बयान दर्ज कराए गए।
मासूम की बेबाक गवाही बनी सजा का मुख्य आधार
अदालत में छह वर्ष की मासूम पीड़िता द्वारा दी गई निडर गवाही दोषी को सख्त सजा दिलाने का सबसे बड़ा आधार बनी। पीड़िता ने क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान बेहद निर्भीकता से बताया कि आरोपी चाचा उसे जबरन घेर में ले गया था और जब उसने बचाने के लिए शोर मचाया, तो उसे थप्पड़ मारे गए। मासूम खुद ही किसी तरह अपने घर पहुंची थी। हालांकि बचाव पक्ष ने यह तर्क देकर मामले को भटकाने की कोशिश की कि बच्ची ने माता-पिता के सिखाने पर बयान दिया है, परंतु अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
भारी जुर्माने के साथ सुनाई गई दोहरी सजा और पीड़िता को मुआवजा
बुधवार को विशेष पॉक्सो कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए बीएनएस की धारा 65(2) तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत शेष स्वाभाविक जीवनकाल तक के लिए सश्रम आजीवन कारावास और 50 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया। इसके अलावा धारा 137(2) के तहत सात वर्ष के अतिरिक्त सश्रम कारावास व 10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई, जो दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जुर्माने की पूरी 60 हजार रुपये की राशि पीड़ित मासूम को क्षतिपूर्ति और प्रतिकर के रूप में प्रदान की जाएगी।
समाज में कड़ा संदेश देने के लिए निवारक सिद्धांत का पालन
मामले की पैरवी कर रहे एडीजीसी फौजदारी विनय अरोरा और विक्रांत राठी ने बताया कि बचाव पक्ष द्वारा आरोपी के दिव्यांग होने और जमीन विवाद का हवाला देकर नरमी बरतने की मांग की गई थी। इस पर पीठासीन अधिकारी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसे वीभत्स अपराधों में समाज के समक्ष एक कठोर नजीर पेश करना बेहद आवश्यक है, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति किसी अबोध बच्चे की तरफ बुरी नजर उठाने का दुस्साहस न कर सके।

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