छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बदली परंपरा, न्यायिक कामकाज को लेकर जारी किया अहम आदेश

बिलासपुर| छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में बड़ा और स्पष्ट निर्णय सुनाया है। अदालत ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया है कि किसी न्यायिक अधिकारी या अधिवक्ता के निधन पर शोकसभा (श्राद्ध/श्रद्धांजलि सभा) आयोजित करना एक सम्मानजनक और आवश्यक परंपरा जरूर है, लेकिन इसके आधार पर पूरे दिन की न्यायिक कार्यवाही को पूरी तरह रोक देना किसी भी लिहाज से उचित नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतों की सबसे पहली और सर्वोपरि जिम्मेदारी देश के आम नागरिकों को समय पर न्याय उपलब्ध कराना है, इसलिए न्यायिक संस्थानों को ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिससे श्रद्धांजलि कार्यक्रम भी संपन्न हो जाएं और अदालती कामकाज भी अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो।

72 वर्षीय बुजुर्ग की याचिका पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश

यह पूरा कानूनी मामला किराया नियंत्रक (रेंट कंट्रोलर) न्यायालय से जुड़ा हुआ है। बीते 2 फरवरी 2026 को शोकसभा का हवाला देकर एक मामले की चल रही सुनवाई को बिना किसी ठोस कारण के अगले दिन के लिए टाल दिया गया था। इस मनमाने आदेश से प्रताड़ित और व्यथित होकर 72 वर्षीय एक बुजुर्ग याचिकाकर्ता ने इस स्थगन आदेश को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले की गंभीरता को समझते हुए जब हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई की, तो उसने पाया कि केवल एक शोकसभा का हवाला देकर पूरे दिन के न्यायिक कार्यों को ठप कर देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है। इसी आधार पर अदालत ने किराया नियंत्रक द्वारा पारित किए गए स्थगन आदेश को पूरी तरह से निरस्त (रद्द) कर दिया।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का दिया गया हवाला

अपने इस फैसले में माननीय हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष प्रकाश डाला कि देश के प्रत्येक नागरिक की न्याय तक निर्बाध और समय पर पहुंच भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का एक अभिन्न और अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में सभी अदालतों और न्यायिक अधिकारियों का यह नैतिक व संवैधानिक दायित्व है कि वे किसी भी ऐसे कारण से न्यायिक कार्यों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न न होने दें, जिससे आम जनता को परेशानी हो।

परंपरा और न्याय के बीच संतुलन बनाना जरूरी

अदालत ने अपनी टिप्पणी में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि शोकसभा जैसी परंपराएं बेहद गरिमामय हैं और समाज में उनका पूरा सम्मान किया जाना चाहिए, परंतु इसके साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया भी सुचारु रूप से बिना किसी रुकावट के चलती रहे। अदालतों को परंपरा और कार्य के बीच एक ऐसा संतुलन बनाकर चलना होगा, जिससे देश के नागरिकों को न्याय मिलने में किसी भी प्रकार की लंबी देरी का सामना न करना पड़े।

भविष्य के लिए हाईकोर्ट के सख्त निर्देश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले के अंत में यह स्पष्ट निर्देश भी जारी किए हैं कि भविष्य में कभी भी शोकसभा या अन्य ऐसे आयोजनों के नाम पर पूरे दिन की अदालती सुनवाई को स्थगित करने जैसी स्थितियों से पूरी तरह बचा जाना चाहिए। सभी न्यायिक संस्थानों को ऐसी सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली अपनानी चाहिए जिससे शोक संतप्त श्रद्धांजलि कार्यक्रम भी गरिमापूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें और साथ ही आम जनता के हित में नियमित न्यायिक कार्य भी सुचारു रूप से जारी रहें।