नई दिल्ली। आज के दौर में देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुकी है। कार या बाइक में 500 रुपये का ईंधन डलवाने के बाद कुछ ही किलोमीटर का सफर तय करते ही फ्यूल टैंक का कांटा फिर से नीचे आ जाता है। पेट्रोल की ये बढ़ती कीमतें आज आम आदमी की जेब पर सीधा असर डाल रही हैं। लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि देश की आजादी के समय पेट्रोल की कीमतें इतनी कम थीं कि आज के एक लीटर पेट्रोल के दाम में तब पूरा ड्रम भरा जा सकता था?
1947 में सिर्फ 25 पैसे था दाम, आज के ₹102 में मिलता था 408 लीटर ईंधन
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1947 में भारत में पेट्रोल की कीमत महज 25 से 27 पैसे प्रति लीटर हुआ करती थी। इसका सीधा सा मतलब यह है कि आज आप जितने पैसों (करीब 102 रुपये) में सिर्फ 1 लीटर पेट्रोल खरीदते हैं, उतने ही पैसों में आजादी के समय लगभग 408 लीटर पेट्रोल मिल जाता था, जो कि दो बड़े ड्रमों को भरने के लिए काफी था।
कभी 'स्टेटस सिंबल' हुआ करती थी कार, सड़कों पर दिखती थीं एंबेसडर और फिएट
आज के समय में अमूमन हर मध्यमवर्गीय परिवार के घर के बाहर बाइक या कार खड़ी दिख जाती है, लेकिन आजादी के शुरुआती दौर में ऐसा नहीं था। उस जमाने में निजी वाहन या कार रखना केवल बेहद अमीर लोगों की पहचान यानी 'स्टेटस सिंबल' माना जाता था। उस दौर की सड़कों पर एंबेसडर, पुरानी फिएट और शेवरले जैसी चुनिंदा गाड़ियां ही शान से दौड़ती थीं। वाहन बेहद कम होने के कारण आज की तरह पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लंबी-लंबी कतारें भी नहीं लगती थीं।
100 रुपये महीने की नौकरी थी 'शानदार सैलरी', सीमित थे संसाधन
कीमतों की इस तुलना को समझने के लिए उस दौर की कमाई को देखना भी जरूरी है। साल 1947 के आसपास देश में 100 से 150 रुपये प्रति महीने की नौकरी को एक बेहद शानदार और बड़ा वेतन माना जाता था। यही वजह थी कि 25 पैसे लीटर होने के बावजूद पेट्रोल आम जनता की पहुंच से दूर था, क्योंकि लोगों की जरूरतें और संसाधन बेहद सीमित थे।
1928 में खुला था देश का पहला पेट्रोल पंप, मात्र 6 पैसे लीटर थी कीमत
भारत में पेट्रोलिंग के इतिहास से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प तथ्य यह भी है कि देश का सबसे पहला पेट्रोल पंप साल 1928 में मुंबई (तब बॉम्बे) में खुला था। उस समय पेट्रोल की कीमत सिर्फ 6 पैसे प्रति लीटर थी। सबसे मजेदार बात यह है कि उस दौर के पेट्रोल पंप आज के आधुनिक और डिजिटल फ्यूल स्टेशनों जैसे बिल्कुल नहीं दिखते थे, बल्कि वे बेहद साधारण और हाथ से संचालित होने वाले पंप हुआ करते थे।

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