क्या थे बोफोर्स घोटाले के आरोप? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ 40 साल पुराना मामला खत्म

नई दिल्ली| देश के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने ऐतिहासिक हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के वर्ष 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी सिरे से खारिज कर दिया है। इस महत्वपूर्ण और अंतिम न्यायिक निर्णय के साथ ही भारत के सबसे ज्यादा चर्चित, सनसनीखेज और सबसे लंबी अवधि तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक 'बोफोर्स तोप कांड' का पूरा कानूनी अध्याय हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गया है।

सर्वोच्च अदालत का अंतिम फैसला

इस मामले की सुनवाई करने वाली बेंच, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन शामिल थे, ने याचिकाकर्ता (अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल) द्वारा मांगे गए स्थगन (अडजोर्नमेंट) के अनुरोध को स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया और इस मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। गौरतलब है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भी इस मामले में अपील दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 में ही अत्यधिक देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। वर्ष 1986 में हुए इस बहुचर्चित रक्षा सौदे का विवाद लगभग चार दशकों यानी 40 साल तक देश की अदालतों और भारतीय राजनीतिक गलियारों के केंद्र में छाया रहा।

क्या है पूरा बोफोर्स कांड और इसका इतिहास?

यह पूरा बहुचर्चित प्रकरण 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी 'एबी बोफोर्स' के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस रक्षा समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 शक्तिशाली हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। इसके बाद साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं, बिचौलियों और रक्षा अधिकारियों को भारी मात्रा में अवैध कमीशन (रिश्वत) दिए गए थे।

इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार पर गंभीर सवाल खड़े हुए और राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा इसे 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का एक मुख्य कारण माना गया।

सीबीआई जांच और सप्लीमेंट्री चार्जशीट

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने जनवरी 1990 में औपचारिक एफआईआर दर्ज कर अपनी जांच शुरू की थी। लंबी जांच के बाद अक्टूबर 2000 में दायर की गई पूरक चार्जशीट (सप्लीमेंट्री चार्जशीट) में हिंदुजा बंधुओं—श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा का नाम भी बतौर आरोपी शामिल किया गया था।

दिल्ली हाईकोर्ट का 2005 का ऐतिहासिक फैसला

दिल्ली उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने अपने एक अहम फैसले में 31 मई 2005 को हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया था। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए यह भी बताया था कि इस लंबी जांच प्रक्रिया पर सरकारी खजाने के लगभग 250 करोड़ रुपये पानी की तरह खर्च हो चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और मामला समाप्त

ताजा सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले के इतने लंबे समय तक खिंचने पर गहरी हैरानी व्यक्त की। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम मामले से हटाने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? जब सभी कार्यवाही पहले ही रद्द हो चुकी हैं, तो यह सब क्या है? आखिर कितने साल बीत चुके हैं?'

वहीं, वकील द्वारा अदालत को यह याद दिलाए जाने पर कि यह रक्षा सौदा मूल रूप से 1986 में हुआ था, बेंच ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और किसी भी प्रकार की देरी, सुनवाई या गुंजाइश की कोई जगह नहीं बची है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम और निर्णायक फैसले के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी देश की सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुकी हैं।