August 26, 2026

आरक्षण बहस ने पकड़ा तूल, BJP प्रवक्ता अजय आलोक के बयान से नई रार

नई दिल्ली। देश में जातिगत आरक्षण में बदलाव और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी नियमों को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक के बयान से राजनीतिक पारा चढ़ गया है। अजय आलोक ने केंद्र सरकार के फैसलों का बचाव करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर सामान्य वर्ग की पुरानी चिंताओं का समाधान किया था। इसके साथ ही उन्होंने ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने और रोहिणी आयोग के जरिए पिछड़ों में उप-वर्गीकरण (सब-कैटेगरी) के प्रयासों का भी जिक्र किया।

आरक्षण विरोधी आंदोलनों पर उठाए सवाल, कार्यकर्ताओं ने घेरा

भाजपा प्रवक्ता ने यूजीसी (UGC) के 2026 इक्विटी नियमों और आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों पर निशाना साधते हुए इन्हें हिंदू समाज में जातिगत विभाजन बढ़ाने की साजिश करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब रोहिणी आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि कई पिछड़ी जातियों तक आरक्षण का लाभ नहीं पहुंचा, तो बहस उन वंचित समुदायों तक हक पहुंचाने पर होनी चाहिए न कि व्यवस्था खत्म करने पर।

अजय आलोक की इस टिप्पणी पर 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' से जुड़े कार्यकर्ताओं ने तीखा पलटवार किया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि आरक्षण व्यवस्था सामान्य वर्ग को प्रभावित करती है, तो उन्हें इस पर पुनर्विचार की मांग करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने प्रवक्ता के पुराने बयानों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि अगर किसी वर्ग से जुड़े मुद्दे पर सिर्फ उसी वर्ग को बोलने का हक है, तो उन्होंने ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला जैसे मामलों पर अपनी राय क्यों व्यक्त की थी।

UGC के 2026 नियमों से बढ़ा विवाद और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

विवाद का मुख्य केंद्र यूजीसी के नए इक्विटी नियम (2026) हैं, जिन्हें उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाया गया था। हालांकि, सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों द्वारा इसके कुछ प्रावधानों को अस्पष्ट बताए जाने के बाद जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी। इसके बाद से ही आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने और क्रीमी लेयर की समीक्षा जैसी मांगों को लेकर आंदोलन तेज हो गया, जिसके तहत 21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया।

2027 चुनाव से पहले भाजपा के सामने संतुलन बनाने की चुनौती

इस मुद्दे ने भाजपा के भीतर और उसके सहयोगी दलों के बीच भी राजनीतिक खींचतान बढ़ा दी है। एक ओर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और रामदास आठवले आरक्षण खत्म करने या कमजोर करने के किसी भी प्रयास का मुखर विरोध कर चुके हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलनकारियों से मुलाकात कर उनकी मांगें केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का आश्वासन दिया है। वर्ष 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आरक्षण का यह मुद्दा भाजपा के लिए बेहद संवेदनशील साबित हो सकता है, जहां उसे अपने पारंपरिक सामाजिक न्याय के एजेंडे और सामान्य वर्ग की नाराजगी के बीच संतुलन साधना होगा।