November 5, 2026

मध्य प्रदेश में पर्यावरण स्वीकृतियों पर फिर घमासान, ACS की भूमिका पर सवाल

भोपाल। मध्य प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण और अनुमतियों से जुड़ी प्रमुख सरकारी संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर प्रशासनिक गलियारों में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्टेट एनवायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (सिया) के पुराने घटनाक्रमों के बाद अब मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका, प्रशासनिक पदस्थापना और निर्णय लेने के अधिकारों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इस बार भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी की कार्यप्रणाली, उनकी मंडल में ज्वाइनिंग तथा उनके द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण फैसले प्रशासनिक हलकों में चर्चा और विवाद का मुख्य विषय बने हुए हैं।

वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकारों पर उठे सवाल और शिकायत

पर्यावरण एवं वन्यजीव मामलों के विशेषज्ञ अजय दुबे ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय स्तर पर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी की प्रदूषण नियंत्रण मंडल में ज्वाइनिंग, कार्यभार ग्रहण करने की प्रक्रिया और नीतिगत निर्णय लेने के विधिक अधिकारों पर कड़ा ऐतराज जताया है। शिकायत के पश्चात इस पूरे मामले में जल्द ही उच्चस्तरीय जांच के आदेश जारी होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। यदि औपचारिक जांच शुरू होती है, तो अनिरुद्ध मुखर्जी के कार्यकाल में जारी की गई विभिन्न पर्यावरणीय अनुमतियों, अधिकारियों की पदोन्नति और तबादलों से जुड़े फैसलों की गहन पड़ताल की जाएगी और संबंधित अधिकारियों से जवाब-तलब हो सकता है।

सिया के पुराने विवादों की पुनरावृत्ति

प्रदेश की पर्यावरण मंजूरियों से जुड़ी संस्थाओं में विवाद का यह कोई पहला मौका नहीं है। इससे पूर्व स्टेट एनवायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (सिया) की कार्यप्रणाली को लेकर भी भारी हंगामा हो चुका है। उस दौरान संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष ने बोर्ड से जुड़े तत्कालीन अधिकारियों नवनीत कोठारी और उमा माहेश्वरी की कार्यप्रणाली तथा निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए थे। विवाद गहराने के पश्चात तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग जैन ने हस्तक्षेप करते हुए दोनों अधिकारियों को पद से हटाने और तबादले के निर्देश जारी किए थे। अब सिया के उस प्रकरण के बाद प्रदूषण नियंत्रण मंडल में नया प्रशासनिक पेंच सामने आने से नियामक संस्थाओं की पारदर्शिता पर फिर सवाल उठ रहे हैं।

वर्ष 2019 का प्रशासनिक आदेश और प्रभार पर संशय

इस विवाद की मुख्य वजह वर्ष 2019 में राज्य सरकार द्वारा किया गया एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव है। उस समय सरकार ने नियम में संशोधन करते हुए प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष पद से प्रमुख सचिव (पर्यावरण) का पदेन प्रभार समाप्त कर दिया था और मंडल अध्यक्ष का पद सीधे मुख्यमंत्री के पास रखने की व्यवस्था बनाई थी। ऐसे में सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब मंडल के पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री स्वयं हैं, तब अपर मुख्य सचिव अनिरुद्ध मुखर्जी ने किस प्रशासनिक हैसियत से मंडल में कार्यभार ग्रहण किया। उल्लेखनीय है कि 17 जून 2026 को जारी सरकारी आदेश में उन्हें अपर मुख्य सचिव पर्यावरण और एप्को का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष के प्रभार का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसके बावजूद मंडल में कामकाज संभालते हुए पर्यावरणीय मंजूरियों और प्रशासनिक फेरबदल से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, जिनकी वैधता अब जांच के दायरे में है।