नई दिल्ली। सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों के निजीकरण की प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक तथा आर्थिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के समस्त कर्मचारियों के नाम एक संदेश जारी करते हुए इस मुनाफे वाले संस्थान को बेचने के सरकारी कदम का पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने इस वित्तीय संस्थान को किसी विदेशी इकाई के हाथों सौंपे जाने के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राहुल गांधी का कहना है कि जनता के धन से खड़े किए गए ये बैंक केवल क्रय-विक्रय की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक रीढ़ और विकास के सशक्त माध्यम हैं।
संसद में उठाए गए सवाल और निजीकरण का विरोध
राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों को भेजे अपने पत्र में स्मरण कराया कि गत वर्ष मार्च के महीने में बैंक कर्मियों का एक प्रतिनिधिमंडल संसद भवन में उनसे मिला था और यह सवाल उठाया था कि कर्मचारियों के अथक परिश्रम से मुनाफे की श्रेणी में आए इस बैंक का निजीकरण क्यों किया जा रहा है। उन्होंने इस मसले को संसद के पटल पर भी पुरजोर तरीके से उठाया और सरकार से जानना चाहा कि फायदे में चल रहे संस्थान को बेचने का औचित्य क्या है तथा इसके मौजूदा कर्मचारियों और जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। हालांकि, विपक्षी खेमे का आरोप है कि सरकार की तरफ से इस संबंध में कोई भी संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। वर्तमान योजना के तहत सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की संयुक्त पचानवे प्रतिशत हिस्सेदारी को घटाकर मात्र चौंतीस प्रतिशत किए जाने की तैयारी है, जिससे प्रबंधन का नियंत्रण निजी हाथों में चला जाएगा।
घाटे से उबरकर नौ हजार करोड़ के मुनाफे तक का सफर
बैंक के ऐतिहासिक संघर्ष और वित्तीय सुधार का जिक्र करते हुए राहुल गांधी ने बताया कि एक समय भारी घाटे की मार झेल रहा यह बैंक कर्मचारियों की कड़ी मेहनत के बूते शानदार वापसी करते हुए पिछले वर्ष नौ हजार करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाने में सफल रहा है। इसके साथ ही उन्होंने वर्ष 2003 में संसद के भीतर सरकार द्वारा दिए गए उस आश्वासन की भी याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि बैंक में सरकारी हिस्सेदारी कभी भी इक्यावन प्रतिशत से कम नहीं होने दी जाएगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संसद में दिया गया औपचारिक आश्वासन देश की पूरी जनता के साथ किया गया नैतिक वादा होता है।
आरक्षण के अधिकार और कर्मचारियों के हितों पर संभावित असर
निजीकरण के दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए राहुल गांधी ने चेतावनी दी है कि बैंक के निजी स्वामित्व में तब्दील होते ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के युवाओं को मिलने वाला संवैधानिक आरक्षण का लाभ समाप्त हो जाएगा। इसके अतिरिक्त बैंक कर्मियों की सेवा शर्तें और सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वे सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की नीति के खिलाफ पूरी दृढ़ता से बैंक कर्मचारियों के साथ खड़े हैं और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हरसंभव संघर्ष करेंगे।

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