चंडीगढ़। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट में पंजाब की कानून व्यवस्था को लेकर बेहद चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं से झपटमारी के मामलों में पंजाब देश के सभी राज्यों को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है। वर्ष 2024 के आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि राज्य में प्रति लाख आबादी पर अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जो शहरी सुरक्षा और पुलिस की प्रभावी गश्त पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है।
झपटमारी की दर में पंजाब का देश भर में प्रथम स्थान
पंजाब में झपटमारी की घटनाएं इस कदर बढ़ गई हैं कि आबादी के अनुपात में यह देश का सबसे असुरक्षित राज्य बनकर उभरा है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि लुधियाना, अमृतसर और मोहाली जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में मोबाइल, चैन और पर्स छीनने की वारदातों ने आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं के मन में डर पैदा कर दिया है। पुलिस प्रशासन द्वारा समय-समय पर चलाए गए विशेष अभियानों के बावजूद अपराध दर में यह उछाल प्रशासनिक विफलता और अपराधियों के बुलंद हौसलों को दर्शाता है, जिससे राज्य की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
नशा तस्करी और संपत्ति अपराधों का गहराता गठजोड़
राज्य में बढ़ते अपराधों का एक मुख्य कारण नशे की लत और इसके अवैध व्यापार को माना जा रहा है क्योंकि एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मामलों में पंजाब देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। सुरक्षा एजेंसियों की जांच में यह संकेत मिले हैं कि झपटमारी और चोरी जैसी वारदातों को अंजाम देने वाले गिरोहों का सीधा जुड़ाव नशे की लत से है और नशे की आपूर्ति के लिए अपराधी इस तरह के छोटे संपत्ति अपराधों का सहारा ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त, नशीले पदार्थों की ओवरडोज से होने वाली मौतों के आंकड़े और अवैध शराब के सेवन से होने वाली मौतें राज्य के सामाजिक और सुरक्षा ढांचे के लिए एक दोहरी चुनौती पेश कर रही हैं।
संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा और गंभीर अपराधों की चुनौतियां
रिपोर्ट में न केवल झपटमारी बल्कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों ने भी सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। दुष्कर्म और पाक्सो एक्ट के तहत दर्ज हजारों मामले यह संकेत देते हैं कि संवेदनशील वर्गों को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम अब भी जमीनी स्तर पर पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाए हैं। हत्या के बढ़ते मामलों और गंभीर श्रेणी के अपराधों का नियंत्रण से बाहर होना यह स्पष्ट करता है कि केवल आंकड़ों में सुधार के बजाय सामाजिक स्तर पर बदलाव और पुलिसिंग को और अधिक आधुनिक व सतर्क बनाने की तत्काल आवश्यकता है।

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