August 25, 2026

8.7 करोड़ युवाओं को लेकर NITI Aayog की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, शिक्षा और रोजगार के बीच बढ़ी खाई

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने देश के युवाओं के भविष्य को लेकर एक गंभीर स्थिति सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 8.7 करोड़ भारतीय युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न ही किसी रोजगार से जुड़े हैं और न ही किसी प्रकार का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। आयोग ने इसे कौशल विकास और रोजगार के मोर्चे पर एक बड़ी चुनौती बताया है।

2021 के सर्वे के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट

नीति आयोग ने 'Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047' शीर्षक से यह रिपोर्ट जारी की है। इसमें 8.7 करोड़ युवाओं का यह आंकड़ा 2021 के नेशनल सैंपल सर्वे के 78वें दौर के आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है। रिपोर्ट में देश के कार्यबल और विद्यार्थियों को पांच प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनमें स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, औपचारिक और अनौपचारिक रोजगार, शिक्षा-रोजगार-प्रशिक्षण से बाहर रहने वाले यानी NEET युवा, और महिलाएं शामिल हैं।

NEET युवाओं के लिए किफायती और सब्सिडी युक्त प्रशिक्षण की आवश्यकता

नीति आयोग ने 15 से 29 वर्ष के उन युवाओं को NEET श्रेणी में रखा है जो शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण किसी से भी जुड़े नहीं हैं, और इसमें बेरोजगार युवा भी शामिल हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन युवाओं के सामने आय की कमी और पूर्व की शिक्षा पर हुआ खर्च सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे युवाओं के लिए किफायती या सब्सिडी वाले प्रशिक्षण के साथ-साथ वित्तीय सहायता प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है ताकि वे अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकें।

स्थानीय मांग और उभरते क्षेत्रों के अनुरूप कौशल विकास

आयोग ने इस बात पर जोर दिया है कि कार्यबल और NEET युवाओं के लिए करियर के बीच में कौशल को उन्नत करने यानी रिस्किलिंग, स्वरोजगार के अवसरों और स्थानीय बाजार की मांग के साथ-साथ उभरते हुए क्षेत्रों से जुड़ी ट्रेनिंग पर विशेष ध्यान देना होगा। रिपोर्ट का उद्देश्य युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला बनाने के बजाय उन्हें अपनी क्षमताओं के बल पर स्वरोजगार शुरू करने में सक्षम बनाना है।

कम आय वाले छात्रों के लिए आर्थिक चुनौतियां

विशेष रूप से कम आय वाले परिवारों से आने वाले छात्र कॉलेज की फीस और निजी ट्यूशन के बढ़ते खर्चों के कारण पहले से ही आर्थिक दबाव में रहते हैं। ऐसे में पारंपरिक डिग्री के साथ कोई महंगा अतिरिक्त कौशल हासिल करना उनके लिए व्यावहारिक नहीं होता। इसी आर्थिक मजबूरी के चलते कई छात्र पढ़ाई पूरी होते ही परिवार की सहायता के लिए कम वेतन वाली नौकरियां स्वीकार करने को मजबूर हो जाते हैं या फिर NEET श्रेणी का हिस्सा बन जाते हैं।

योग्यता के अनुरूप रोजगार का सीमित दायरा

रिपोर्ट में उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद बड़े अंतर को भी उजागर किया गया है। नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसी नौकरियों में कार्यरत हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के बिल्कुल अनुरूप हैं। व्यावहारिक शिक्षा और उद्योग की वास्तविक जरूरतों के बीच तालमेल की कमी युवाओं की रोजगार क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है।

अब तक का प्रशिक्षण और भविष्य की दिशा

विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नागरिकों को निरंतर सीखने और आगे बढ़ने के अवसर देने की बात कही गई है। आयोग के अनुसार, वर्ष 2014-15 से लेकर अब तक 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि आने वाले समय में कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय मांग और रोजगार के नए अवसरों के साथ और अधिक मजबूती से जोड़े जाने की जरूरत है।