राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में जिला प्रशासन ने कुष्ठ रोगियों के निशुल्क उपचार और उनके उचित पुनर्वास के महान उद्देश्य से पूर्व में रियासतकाल के दौरान आवंटित की गई लगभग 22.90 एकड़ बेशकीमती सरकारी भूमि को मिशनरी अस्पताल के आधिपत्य से पूरी तरह मुक्त करा लिया है। प्रशासनिक आंकलन के अनुसार मुक्त कराई गई इस जमीन की वर्तमान बाजार कीमत करीब 250 करोड़ रुपए से भी अधिक आंकी गई है। भूखंड के आवंटन से जुड़ी लीज की शर्तों का गंभीर उल्लंघन करने तथा आवंटित भूमि का व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग किए जाने की पुष्टि होने के बाद कलेक्टर जितेंद्र यादव के सख्त निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में यह ऐतिहासिक कार्रवाई अमल में लाई गई है।
राजस्व अभिलेखों में छत्तीसगढ़ शासन का नाम दर्ज करने के निर्देश
जिला प्रशासन ने स्थानीय तहसीलदार को यह स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि सरकारी अभिलेखों और राजस्व दस्तावेजों से संबंधित संस्था का नाम तुरंत प्रभाव से हटाकर वहाँ 'छत्तीसगढ़ शासन' का नाम दर्ज किया जाए। इसके साथ ही प्रशासन ने आगामी सात दिनों के भीतर पूरे परिसर का भौतिक कब्जा अपने हाथ में लेने के सख्त आदेश दिए हैं। स्थानीय प्रशासनिक इतिहास में लीज निरस्त कर इतनी विशाल और बहुमूल्य भूमि को सीधे शासन के अधीन लेने का यह अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा मामला माना जा रहा है।
वर्ष 1944 में कुष्ठ अस्पताल के संचालन हेतु हुआ था आवंटन
शहर के नंदई क्षेत्र में स्थित यह विवादित जमीन स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व यानी 6 अक्टूबर 1944 को तत्कालीन राजनांदगांव रियासत द्वारा 'सुपरिटेंडेंट, मिशनरी बैंड्स आफ द वर्ल्ड लेप्रोसी हॉस्पिटल' के नाम पर आवंटित की गई थी। इस आवंटन का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य क्षेत्र के कुष्ठ रोगियों को पूरी तरह से निशुल्क चिकित्सा, उपचार और पुनर्वास की सुविधा मुहैया कराना था। हालांकि, बाद में इस बात के पुख्ता प्रमाण सामने आए कि बसंतपुर स्थित लेप्रोसी हॉस्पिटल एंड क्लिनिक द्वारा इस बड़े भूखंड का उपयोग नियमों के विरुद्ध किया जा रहा है, जिसके बाद जिला प्रशासन ने पूरे मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के आदेश दिए थे।
तालाब का ठेका, कृषि भूमि का पट्टा और व्यावसायिक दोहन
जांच के दौरान प्रशासन के हाथ कई चौंकाने वाले तथ्य लगे। यह खुलासा हुआ कि जमीन पर मूल रूप से अधिकृत लीजधारी संस्था के स्थान पर वर्ष 1993 में पंजीकृत एक अन्य संस्था अवैध रूप से काबिज थी। लीज के नियमों के मुताबिक इस भूमि का किसी भी स्थिति में हस्तांतरण नहीं किया जा सकता था, इसके बावजूद परिसर के भीतर करीब डेढ़ एकड़ में फैले एक बड़े तालाब को मछली पालन के लिए ठेके पर उठा दिया गया था। इसके अलावा यहाँ की कृषि भूमि को स्थानीय किसानों को रेग (बटाई) पर दिया गया था तथा परिसर के अंदर बने पक्के भवनों व आवासीय क्वार्टरों को पिछले कई वर्षों से किराए पर देकर भारी आर्थिक मुनाफा कमाया जा रहा था।
महज नाममात्र के मरीजों का उपचार और प्रशासन की बड़ी कार्रवाई
प्रशासन द्वारा जब इस संस्था की वित्तीय वर्ष 2024-25 की चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) ऑडिट रिपोर्ट की बारीकी से जांच की गई, तो पोल खुल गई। रिपोर्ट के अनुसार पूरे एक साल के लंबे अंतराल में संस्थान द्वारा औसतन केवल तीन कुष्ठ रोगियों का ही उपचार किया गया था। जिस जमीन को पूरी तरह से सामाजिक, मानवीय और चिकित्सीय सेवा के लिए आरक्षित किया गया था, उसका खुला व्यावसायिक दोहन किया जा रहा था। लीज की तमाम शर्तों के उल्लंघन और जमीन के जरिए अवैध रूप से आर्थिक लाभ कमाने की पुष्टि होने के बाद प्रशासन ने यह बड़ी कार्रवाई करते हुए लीज को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है और इस बहुमूल्य जमीन को सरकारी नियंत्रण में ले लिया है।

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