नोएडा| नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) की ज़िलाधिकारी मेधा रूपम को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत एक छात्रा की हिरासत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली कड़ी फटकार के बाद अब राजनीतिक हलचल भी तेज़ हो गई है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रशासनिक रवैये पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का ज़िक्र करते हुए दावा किया कि ज़िलाधिकारी उनकी पुत्री हैं और दोनों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। महुआ ने छात्रा की अवैध हिरासत को लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक प्रक्रिया के लिए शर्मनाक करार दिया।
सोशल मीडिया पर महुआ मोइत्रा का तीखा प्रहार
महुआ मोइत्रा ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह कार्रवाई लोकतंत्र और कानून की व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए। इस पोस्ट के बाद प्रशासनिक मशीनरी और राजनीतिक गलियारों में नया विवाद पैदा हो गया है।
छात्रा की हिरासत पर हाईकोर्ट की सख्त नाराज़गी
पूरा मामला दिल्ली विश्वविद्यालय की 24 वर्षीया छात्रा आकृति चौधरी को NSA के तहत जेल में रखने से जुड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश शासन और नोएडा प्रशासन के ढुलमुल रवैये पर सख्त आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसे अत्यंत कठोर कानून का प्रयोग करने के लिए प्रशासन के पास ठोस और प्रामाणिक आधार होना अनिवार्य है। कोर्ट के अनुसार, बिना किसी पुख्ता सबूत के छात्रा को जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा हनन है।
पांच लाख रुपये का जुर्माना और वेतन से कटौती का आदेश
अदालत ने पीड़ित छात्रा को तुरंत पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का ऐतिहासिक आदेश सुनाया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि ज़िलाधिकारी और संबंधित पुलिस अधिकारियों (SHO स्तर तक) के वेतन से वसूल की जाए। न्यायपालिका ने संदेश दिया कि जब भी किसी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी से खिलवाड़ होगा, अदालतें पीड़ितों को राहत देने के लिए कठोर निर्णय लेने से नहीं हिचकिचाएंगी।
'अधिकारियों की निष्ठा किसी नेता से नहीं, संविधान से होनी चाहिए'
मामले की सुनवाई करते हुए पीठ ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने सचेत किया कि यदि अधिकारी मनमाने ढंग से नागरिकों के अधिकारों का हनन करेंगे, तो समाज में भय का माहौल बनेगा। कोर्ट ने याद दिलाया कि लोकसेवक जनता के प्रति जवाबदेह हैं और उनकी पहली निष्ठा देश के संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि सत्ता में बैठे किसी राजनीतिक व्यक्ति के प्रति।
गिरफ्तारी के समय और प्रक्रिया पर खड़े हुए सवाल
छात्रा को अप्रैल 2026 में नोएडा में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था और बाद में मई में उस पर NSA लगा दिया गया। हाईकोर्ट के 15 पन्नों के फैसले में अधिकारियों की कार्रवाई की पोल खुली। सरकारी दस्तावेजों में गिरफ्तारी का समय 11 अप्रैल की शाम नोएडा के मेट्रो स्टेशन से दर्शाया गया था, जबकि अन्य रिकॉर्ड में यह तारीख 12 अप्रैल बताई गई। समय के इस बड़े विरोधाभास पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई।
हिंसा भड़काने का नहीं मिला कोई ठोस प्रमाण
प्रशासन ने आरोप लगाया था कि छात्रा हिंसा भड़काने की साजिश में शामिल थी। हालांकि, बार-बार मांगे जाने पर भी सरकारी पक्ष अदालत के समक्ष एक भी ऐसा ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जो यह सिद्ध करे कि उकसावे की कोई गतिविधि हुई थी। कोर्ट ने माना कि पुलिस की अस्पष्ट रिपोर्ट के आधार पर ज़िला मजिस्ट्रेट ने बिना गहन जांच-पड़ताल किए जल्दबाज़ी में यह दमनकारी आदेश जारी कर दिया था।

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