नई दिल्ली। देश की विपक्षी राजनीति में एक बार फिर तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों को एक मंच पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, इन तमाम राजनीतिक कवायदों के बीच अभी तक किसी औपचारिक गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस सुगबुगाहट से एनडीए और कांग्रेस दोनों की आगामी राजनीतिक रणनीतियों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
कांग्रेस से दूरी और क्षेत्रीय दलों की गोलबंदी
हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के मुताबिक, डीएमके और कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ती नजर आ रही हैं। स्टालिन के कांग्रेस से नाराजगी की खबरों के बीच क्षेत्रीय दल एक नए विकल्प की तलाश में हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि वर्तमान राजनीतिक हालात और नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए तीसरे मोर्चें की राह आसान नहीं है। प्रधानमंत्री पद की चाह, सीटों का आपसी बंटवारा और राज्यों में एक-दूसरे के विरोधी हित इस मोर्चे के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। इसके अलावा, ममता बनर्जी और टीएमसी के 'इंडिया' गठबंधन में शामिल हो जाने से समीकरण पहले ही काफी बदल चुके हैं।
भाजपा और कांग्रेस दोनों पर क्या होगा असर?
यदि यह तीसरा मोर्चा धरातल पर उतरता है, तो इसके दोहरे राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। एक तरफ जहां विपक्षी वोटों के बंटवारे से सीधे तौर पर भाजपा को फायदा मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर यह मोर्चा यदि कांग्रेस से अलग हटकर भाजपा विरोधी मतदाताओं को अपनी ओर खींचता है, तो इससे कांग्रेस का विपक्षी नेतृत्व कमजोर हो सकता है। इसके अलावा, संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों का रुख केंद्र सरकार की रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल सभी राजनीतिक दल 'तेल देखो और तेल की धार देखो' की नीति पर चलते हुए आगे के घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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