नई दिल्ली:पश्चिम एशिया में लगातार गहराते भू-राजनीतिक संकट और समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मंडराते खतरों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता को चाक-चौबंद करने के लिए एक बेहद रणनीतिक और बड़ा कदम उठाया है. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितताओं के मद्देनजर देश की शीर्ष सार्वजनिक तेल और गैस अन्वेषण कंपनी ने दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्र में एक विशाल नया रणनीतिक कच्चे तेल का भंडार स्थापित करने की घोषणा की है. इस महत्वपूर्ण परियोजना के जरिए देश किसी भी अंतरराष्ट्रीय आपातकाल या युद्ध जैसी स्थितियों में अपनी घरेलू ऊर्जा जरूरतों को बिना किसी व्यवधान के पूरा करने में सक्षम हो सकेगा.
ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया सुरक्षा कवच, विदेशी तेल पर निर्भरता की चुनौती
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देश के रूप में भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों से आयात करता है. हाल के दिनों में वैश्विक तनाव के चलते जब प्रमुख समुद्री संकीर्ण मार्गों से होने वाली सप्लाई चेन प्रभावित हुई, तो घरेलू स्तर पर सुरक्षात्मक कदम उठाने की आवश्यकता बेहद बढ़ गई. इसी के समाधान के तौर पर सरकारी तेल कंपनी ने नियामक फाइलिंग में जानकारी दी है कि वह मंगलुरु में 17.5 लाख टन की क्षमता वाला एक नया 'राष्ट्रीय रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व' विकसित करने जा रही है, जो संकट के समय देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को थमने नहीं देगा.
व्यावसायिक उपयोग के लिए नीतिगत छूट की तैयारी, वर्तमान भंडारण क्षमता को मिलेगा विस्तार
इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाए रखने के लिए सार्वजनिक उपक्रम की कंपनी केंद्र सरकार से इस नए विशाल भंडार के एक हिस्से को कमर्शियल यानी वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करने की विशेष अनुमति प्राप्त करने का प्रयास कर रही है. वर्तमान में देश के दक्षिण और पूर्वी तटीय इलाकों में पहले से संचालित तीन प्रमुख रणनीतिक भंडारों का प्रबंधन एक विशेष सरकारी इकाई द्वारा किया जा रहा है, जिनकी संयुक्त क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन के करीब है. नई नीति के तहत इन भंडारों के व्यावसायिक इस्तेमाल से देश की तेल कंपनियों को वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव का लाभ उठाने और आपातकालीन स्टॉक को बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय बोझ के बनाए रखने में मदद मिलेगी.
वैश्विक मित्र देशों के साथ मजबूत हो रही एनर्जी पार्टनरशिप, विदेशी निवेश को बढ़ावा
भारत अपनी ऊर्जा भंडारण क्षमताओं को वैश्विक स्तर पर अपग्रेड करने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और जापान जैसे दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार देशों के साथ लगातार सहयोग बढ़ा रहा है. मंगलुरु रिफाइनरी परिसर के समीप पहले से मौजूद भंडारण क्षमता का एक बड़ा हिस्सा यूएई की राष्ट्रीय तेल कंपनी को लीज पर दिया जा चुका है, जो द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों की मजबूती को दर्शाता है. दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुए हालिया समझौतों के तहत खाड़ी देश की दिग्गज ऊर्जा कंपनियां भारत की धरती पर अपने कच्चे तेल के स्टॉक को कई गुना बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर भारतीय हितों के अनुरूप नए लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढांचे को विकसित करने पर तेजी से काम कर रही हैं.
पूर्वी और दक्षिणी तटों पर नए मेगा प्रोजेक्ट्स, भविष्य की किल्लत से मिलेगी मुक्ति
देश को ऊर्जा क्षेत्र में पूरी तरह सुरक्षित बनाने का यह खाका केवल एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार देश के पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटों पर समानांतर रूप से भंडारण नेटवर्क का विस्तार कर रही है. इस व्यापक कार्ययोजना के तहत ओडिशा के चंडीखोल में 4 मिलियन मीट्रिक टन की क्षमता वाला एक विशाल पूर्वी तेल भंडार और कर्नाटक के पादुर में 2.5 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता की एक अतिरिक्त नई फैसिलिटी को धरातल पर उतारने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इन सभी परियोजनाओं के पूर्ण होने के बाद देश के पास इतना पर्याप्त बैकअप होगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मंदी, युद्ध या प्रतिबंधों जैसी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा.

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