नई दिल्ली। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारतीय सेना ने अपनी युद्ध रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए ड्रोन से निगरानी, हमला करने और दुश्मन के ड्रोन को तबाह करने की क्षमता को कई गुना बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। जुलाई से सितंबर के बीच जारी किए गए सेना के खरीद प्रस्तावों (Procurement Proposals) से यह स्पष्ट होता है कि थल सेना ड्रोन युद्ध से जुड़ी अपनी संपूर्ण व्यवस्था को अत्यधिक आधुनिक और अभेद्य बनाने पर केंद्रित है।
ड्रोन खरीद और उन्नत रक्षा प्रणालियों पर जोर
सेना द्वारा जारी निविदाओं के अनुसार, इस नए तंत्र में लंबी दूरी तक निगरानी, सटीक लक्ष्य पहचानने, फर्स्ट पर्सन व्यू (FPV) ड्रोन से सीधे हमले करने या पेलोड गिराने, सैनिकों को विशेष ड्रोन ट्रेनिंग देने और दुश्मन के ड्रोन को खोजकर नष्ट करने वाली आधुनिक तकनीक शामिल है। सेना ने हाल ही में कम ऊंचाई पर आने वाले हवाई खतरों से निपटने के लिए 9 ‘लो एल्टीट्यूड एरियल थ्रेट रिस्पॉन्स एंड मिटिगेशन सिस्टम’ (Low Altitude Aerial Threat Response and Mitigation System) खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है। इससे पहले 10 ‘इंटीग्रेटेड लॉन्ग रेंज सर्विलांस ड्रोन’ के लिए भी टेंडर जारी किया जा चुका है।
ड्रोन निर्माण के लिए 273 जरूरी उपकरणों की सूची
ड्रोन क्षमताओं को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए सेना ने 273 महत्वपूर्ण कलपुर्जों और उपकरणों की एक विस्तृत फेहरिस्त जारी की है। इसमें मोटर, इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम, फ्लाइट कंट्रोलर, कैमरा, हाई-कैपेसिटी बैटरी और 'रिमोटली ऑपरेटेड मल्टी-पेलोड रिलीज मैकेनिज्म' शामिल हैं। जहां सामान्य सर्विलांस ड्रोन केवल लाइव फुटेज या तस्वीरें भेजने का काम करते हैं, वहीं पेलोड रिलीज मैकेनिज्म से लैस होने के बाद ड्रोन तय सीमा या दुश्मन के ठिकानों पर विस्फोटक या जरूरी सामान गिराने में सक्षम हो जाते हैं।
विशेषज्ञों की राय: स्वदेशी तकनीक और त्वरित मरम्मत की जरूरत
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत को अपनी ड्रोन युद्ध क्षमता का आकलन चीन और पाकिस्तान की संयुक्त चुनौतियों को ध्यान में रखकर करना होगा। चीन के पास उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, एआई तकनीक और विशाल ड्रोन उत्पादन क्षमता मौजूद है, जबकि पाकिस्तान भी चीनी तकनीक और तुर्की की मदद से अपनी ड्रोन ताकत बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल ड्रोन खरीदने की नहीं, बल्कि सीमा पर लगातार निगरानी, सटीक जवाबी हमले और दुश्मन के ड्रोन हमलों से बचाव की भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की क्षमता का मुकाबला करने के लिए भारत को स्वदेशी निर्माण (Indigenisation), तेज मरम्मत सुविधा और कम लागत में बड़े पैमाने पर ड्रोन बनाने की क्षमता विकसित करनी होगी।

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