October 15, 2026

कभी 25 रुपये था मेहनताना, आज गरबा की पहचान हैं फाल्गुनी पाठक; जानिए उनकी कहानी

'मैंने पायल है छनकाई', 'याद पिया की आने लगी' और 'चूड़ी जो खनके' जैसे अमर गीतों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली फाल्गुनी पाठक आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह सिर्फ एक लोकप्रिय गायिका ही नहीं, बल्कि भारत में नवरात्रि और गरबा का पर्याय बन चुकी हैं। जब भी डांडिया और गरबा का जिक्र होता है, तो सबसे पहले उन्हीं के गानों की गूंज सुनाई देती है। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर कतई आसान नहीं रहा है।

बचपन का संघर्ष और संगीत के प्रति जुनून

फाल्गुनी पाठक का जन्म वर्ष 1971 में मुंबई के खार इलाके के एक गुजराती परिवार में हुआ था। वह पांच बहनों में सबसे छोटी थीं। उनके घर में हमेशा से संगीत का माहौल रहा और रेडियो पर पुराने हिंदी गाने बजते रहते थे। उनकी एक बहन शास्त्रीय संगीत सीखती थीं, जिन्हें देखकर फाल्गुनी भी गाने का रियाज करने लगीं।

उन्होंने कभी संगीत की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली, बल्कि पुराने गाने सुनकर अपनी आवाज को निखारा। शुरुआत में वह घर की छत पर गाती थीं और आस-पड़ोस के लोग उनकी सुरीली आवाज के कायल होकर उनसे अपनी पसंद के गाने सुनाने की फरमाइश करते थे।

परिवार की उम्मीदें और पहली कमाई

फाल्गुनी के माता-पिता की इच्छा थी कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर डॉक्टर या इंजीनियर बने। उस दौर में किसी लड़की का कम उम्र में मंच पर गाना और पेशेवर कार्यक्रमों में हिस्सा लेना आसान नहीं था।

मात्र 9 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में उन्होंने फिल्म 'कुर्बानी' का मशहूर गाना 'लैला मैं लैला' गाया था। इस शानदार परफॉर्मेंस के लिए उन्हें बतौर इनाम 25 रुपये मिले थे, जो उन्होंने अपनी मां को सौंप दिए थे। हालांकि, गाने के प्रति इस झुकाव पर उनके पिता नाराज भी हुए थे, लेकिन उनका संगीत प्रेम कम नहीं हुआ।

छोटे कार्यक्रमों से लेकर अपने म्यूजिक ग्रुप तक का सफर

समय के साथ फाल्गुनी ने छोटे-छोटे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गाना शुरू किया। वर्ष 1989 में उन्होंने 'द बीटरज' नामक एक डांडिया ग्रुप के साथ काम करना शुरू किया, जिससे उन्हें गरबा संगीत को करीब से समझने का मौका मिला।

1990 के दशक में उन्होंने अपना खुद का म्यूजिक ग्रुप 'ता थैया' शुरू किया। उन्होंने पारंपरिक गुजराती लोकधुनों और आधुनिक संगीत का ऐसा अनूठा मेल तैयार किया, जिसने युवाओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। धीरे-धीरे उनके शोज में भारी भीड़ जुटने लगी और उनका नाम नवरात्रि का मुख्य आकर्षण बन गया।

जब एक गाने ने बदल दी पूरी पहचान

हालांकि फाल्गुनी क्षेत्रीय स्तर पर लोकप्रिय थीं, लेकिन वर्ष 1998 में रिलीज हुए उनके गाने 'याद पिया की आने लगी' ने उन्हें रातों-रात पूरे देश में स्टार बना दिया। इसके बाद 'मैंने पायल है छनकाई' और 'मेरी चुनर उड़ उड़ जाए' जैसे गानों ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। उनके गानों के वीडियो और उनका अनोखा अंदाज आज भी लोगों के जेहन में ताजा है।

'गरबा क्वीन' के लाइव शोज का जादू

फाल्गुनी पाठक की लोकप्रियता का सबसे बड़ा आधार उनके एनर्जेटिक लाइव शोज हैं। उनके कार्यक्रमों में लोग सिर्फ गाने सुनने नहीं, बल्कि खुद झूमने और गरबा खेलने आते हैं। उनकी लोकप्रियता मुंबई और गुजरात से निकलकर देश के अन्य राज्यों तथा विदेशों में बसे भारतीयों तक फैल चुकी है।

इस वर्ष भी मुंबई के प्रतिष्ठित जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में 'वेस्ट एवेन्यू रियल्टी नवरात्रि उत्सव 2026' का आयोजन हो रहा है, जहां फाल्गुनी अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरेंगी। इस बड़े इवेंट के लिए टिकटों की कीमतें 2,000 रुपये से लेकर 2.04 लाख रुपये तक रखी गई हैं।

निजी जिंदगी को रखा हमेशा लाइमलाइट से दूर

अपनी पेशेवर जिंदगी में अपार सफलता हासिल करने वाली फाल्गुनी ने अपनी निजी जिंदगी को हमेशा मीडिया और चकाचौंध से दूर रखा। उन्होंने अपने काम को ही अपनी पहचान बनाया। वर्ष 2012 के एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद को सिंगल बताया था और कहा था कि वह अपनी इस जीवन शैली से पूरी तरह खुश हैं।

बॉलीवुड से दूरी और लाइव मंच का सुकून

इतनी बड़ी स्टार होने के बावजूद फाल्गुनी ने कभी बॉलीवुड में नियमित रूप से प्लेबैक सिंगिंग को करियर नहीं बनाया। एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया था कि स्टूडियो की भागदौड़ और फिल्म इंडस्ट्री की तुलना में उन्हें दर्शकों के सामने लाइव परफॉर्म करने और संगीत की अपनी दुनिया में अधिक आंतरिक शांति व संतुष्टि मिलती है।

बदलते दौर में भी क्यों बरकरार है उनका जादू?

समय के साथ कैसेट से लेकर डिजिटल स्ट्रीमिंग तक संगीत सुनने का माध्यम बदल चुका है, लेकिन फाल्गुनी पाठक के गानों का क्रेज आज भी कम नहीं हुआ है। हर साल नवरात्रि आते ही उनके पुराने और नए दोनों गीत हर जगह गूंजने लगते हैं। उनकी सुरीली आवाज और अनूठा अंदाज आज की युवा पीढ़ी को भी उतना ही आकर्षित करता है, जितना पिछली पीढ़ियों को करता था।