कांकेर: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग को मलेरिया मुक्त बनाने के लिए बड़े-बड़े दावे और प्रशासनिक अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। उत्तर बस्तर के कांकेर जिले में महज 10 दिनों के भीतर मलेरिया की चपेट में आने से तीन स्कूली छात्रों की दर्दनाक मौत हो गई है। इसके अलावा 9 अन्य बच्चे भी मलेरिया पॉजिटिव पाए गए हैं, जिनमें से 2 बच्चों की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें बेहतर इलाज के लिए रायपुर रेफर करना पड़ा है।
बस्तर संभाग में मलेरिया का डरावना कहर
आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 से लेकर अब तक पूरे बस्तर संभाग में कुल 8,426 मलेरिया के मरीज मिल चुके हैं।
-
इनमें 7,021 मामले खतरनाक माने जाने वाले पी. फाल्सीपेरम (P. falciparum) के हैं।
-
इसके अलावा 1,168 मामले पी. विवैक्स (P. vivax) और 254 मामले मिक्स मलेरिया के दर्ज किए गए हैं।
कांकेर जिले में मलेरिया से हुई मौतों का सिलसिला:
-
16 जुलाई: सरंडी बालक छात्रावास के 14 वर्षीय छात्र करन गोटा की मलेरिया से मौत।
-
25 जुलाई: डोमाहर्रा गांव की 9 वर्षीय छात्रा करीना विश्वकर्मा की संक्रमण के कारण जान गई।
-
26 जुलाई: मर्दापोटी आश्रम के 9 वर्षीय छात्र सुभाष कुमेटी की भी मलेरिया से मौत हो गई।
स्वास्थ्य विभाग के दावों की खुली पोल
एक तरफ स्वास्थ्य विभाग यह दावा कर रहा है कि संभागभर में 6.63 लाख से अधिक ब्लड स्लाइड्स की जांच की जा चुकी है, वहीं दूसरी तरफ लगातार हो रही मौतों ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
-
यदि रोकथाम और नियंत्रण के उपाय वास्तव में प्रभावी होते, तो इतने बड़े पैमाने पर संक्रमण नहीं फैलता।
-
ग्रामीण और अंदरूनी वनांचल क्षेत्रों में आज भी जगह-जगह बारिश का पानी भरा हुआ है, जिससे मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है।
-
गांवों में समय पर लार्वा रोधी दवा का छिड़काव नहीं किया जा रहा है और स्वास्थ्य जागरूकता की भी भारी कमी है, जिसके चलते हर साल बरसात के मौसम में मलेरिया एक बार फिर विकराल रूप धारण कर लेता है।
बढ़ते मामलों ने खड़े किए गंभीर प्रशासनिक सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कागजी जांच और दवाइयों के वितरण से मलेरिया पर पूरी तरह नियंत्रण पाना संभव नहीं है। इसके लिए गांवों में समय पर नई मेडिकेटेड मच्छरदानियों का वितरण, जलभराव की सही रोकथाम, स्वास्थ्य टीमों की नियमित निगरानी और जन-भागीदारी का होना बेहद जरूरी है।
हालांकि जिला मलेरिया अधिकारी का कहना है कि दर्भा और बकावंड जैसे कुछ चुनिंदा ब्लॉकों में मामलों में थोड़ी कमी जरूर आई है तथा केंद्र सरकार की ओर से नई मेडिकेटेड मच्छरदानियां भी भेजी जा रही हैं, लेकिन जब तक ये आवश्यक संसाधन धरातल पर जरूरतमंद गांवों तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक मासूमों की जान का खतरा यूं ही बना रहेगा। बस्तर में मलेरिया के इन बढ़ते मामलों ने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल अभियान चलाने के कागजी दावे करना काफी है, या फिर गांवों के आखिरी छोर तक समय पर संसाधन पहुंचाना ही असली चुनौती है?

More Stories
4 वरिष्ठ IFS अधिकारियों के रिटायरमेंट से वन विभाग में बढ़ेगी अधिकारियों की कमी
हाई कोर्ट का बड़ा निर्देश: विधायक अनुज शर्मा से जुड़े आपत्तिजनक पोस्ट तत्काल हटाए जाएं
सारंगढ़ में बारिश का कहर, उफनते नाले में समाई कार; पति-पत्नी का सुराग नहीं