September 25, 2026

बुआ के साथ फिल्में देखती थीं दिव्या दत्ता, यहीं से जगा एक्ट्रेस बनने का सपना

मुंबई। बहुमुखी प्रतिभा की धनी अभिनेत्री दिव्या दत्ता आज अपना 49वां जन्मदिवस मना रही हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सदैव अग्रणी रहने के उपरांत भी उन्होंने अभिनय की दुनिया में अपना करियर निर्मित किया। भारतीय सिनेमा में लगभग 32 वर्षों के लंबे सफर के दौरान उन्होंने अनेक स्मरणीय भूमिकाएं निभाई हैं। पंजाब के लुधियाना जैसे शहर से निकलकर मायानगरी मुंबई तक का उनका यह सफर कड़े संघर्ष और निरंतर परिश्रम की गाथा है।

चिकित्सक परिवार में जन्म और बाल्यकाल

अपनी सहज मुस्कान और जीवंत अभिनय के लिए जानी जाने वाली दिव्या दत्ता का जन्म 25 सितंबर 1977 को लुधियाना में चिकित्सक माता-पिता के परिवार में हुआ था। चिकित्सकों के वातावरण में पले-बढ़े होने के बावजूद उनका झुकाव बचपन से ही कला और अभिनय की ओर हो गया था। बाल्यकाल में उनकी चंचलता के कारण उन्हें दिल्ली स्थित उनकी बुआ के पास भेजा गया, जहां उनके इस हुनर को दिशा मिली।

दिल्ली में प्रवास और फिल्मों के प्रति रुझान

दिव्या दत्ता के अनुसार, उनके माता-पिता के सरकारी सेवा में होने के कारण लुधियाना स्थित आवास पर रोगियों का आवागमन लगा रहता था, जिससे उनकी भाषा पर स्थानीय प्रभाव आने लगा था। इसके समाधान हेतु उन्हें दिल्ली में अध्यापन कार्य से जुड़ी उनकी बुआओं के पास भेजा गया। वहां सबसे छोटी बुआ के साथ फिल्में देखने और अभिनेत्रियों की शैली का अनुकरण करने से उनके मन में सिनेमा के प्रति गहरा आकर्षण उत्पन्न हुआ।

पिता का आकस्मिक देहांत और पारिवारिक परिस्थितियां

जब दिव्या मात्र सात वर्ष की थीं, तब उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया। इस कठिन समय के पश्चात उनकी माता डॉ. नलिनी दत्ता, जो स्वयं एक सरकारी अधिकारी थीं, ने अकेले ही दिव्या और उनके भ्राता का पालन-पोषण किया। पिता के देहांत के उपरांत दिव्या पुनः अपनी माता के पास लुधियाना लौट आईं और अपनी माता की सहचरी बन गईं।

माता से प्राप्त हुआ अभिनय का प्राथमिक प्रशिक्षण

दिव्या ने अपनी माता के अभिनय कौशल और पुरानी अभिनेत्रियों के हाव-भाव की नकल करते हुए अनजाने में ही अभिनय की बारीकियां सीखीं। आगे चलकर प्रसिद्ध फिल्म ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ में अभिनय के दौरान उनकी माता से सीखी यही बातें उनके काम आईं।

मुंबई आगमन का मार्ग और माता का संबल

पत्रिका में प्रकाशित एक टैलेंट हंट प्रतियोगिता का फॉर्म भरने के पश्चात जब उनका चयन हुआ, तब उन्होंने अभिनय को अपना करियर बनाने की इच्छा जताई। यद्यपि परिवार व रिश्तेदार इसके पक्ष में नहीं थे, किंतु उनकी माता ने दृढ़ता से उनका समर्थन किया और सामाजिक विरोध के बीच ढाल बनकर उनके सपनों को उड़ान दी। मुंबई आगमन पर शुरुआती दौर में अस्वीकृति का सामना करने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी पहचान बनाई।

विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं और सिनेमा में योगदान

वर्ष 1994 में फिल्म 'इश्क में जीना इश्क में मरना' से अपने अभिनय सफर का शुभारंभ करने वाली दिव्या दत्ता ने हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु और मलयालम सिनेमा में भी कार्य किया है। उन्होंने 'कसूर' फिल्म में डबिंग आर्टिस्ट के रूप में भी योगदान दिया। अपने करियर में सौ से अधिक फिल्मों और वेब सीरीज़ का हिस्सा रह चुकी दिव्या ने सहायक भूमिकाओं में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

वीर-ज़ारा का 'शब्बो' और करियर का महत्वपूर्ण मोड़

फिल्म 'वीर-ज़ारा' में उनके द्वारा निभाया गया 'शब्बो' का किरदार अत्यंत लोकप्रिय हुआ। प्रारंभ में वे इस भूमिका को लेकर हिचकिचा रही थीं, किंतु फिल्म निर्माता आदित्य चोपड़ा के परामर्श पर उन्होंने इसे स्वीकार किया। आदित्य चोपड़ा ने उन्हें गुणवत्तापूर्ण कार्य करने और अपनी एक विशिष्ट पहचान (विरासत) छोड़ने की सलाह दी, जिसके पश्चात उन्होंने केवल चयनित और गुणवत्तापूर्ण भूमिकाओं का ही चयन किया।

व्यक्तिगत जीवन और विवाह पर दृष्टिकोण

अपनी अविवाहित स्थिति पर बात करते हुए दिव्या दत्ता का मानना है कि जीवन में सही जीवनसाथी का मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि वे स्वयं में पूर्ण महसूस करती हैं और किसी भी संबंध में परस्पर सम्मान, स्वतंत्रता और एक-दूसरे के कार्य का समर्थन सबसे प्रमुख तत्व होता है।