October 28, 2026

CGPSC की लापरवाही पड़ी भारी, मुख्य परीक्षा के अभ्यर्थी को मिलेंगे 50 हजार रुपये

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) की कार्यप्रणाली पर गंभीर लापरवाही बरतने के आरोप में बिलासपुर उच्च न्यायालय ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। आयोग की एक प्रतियोगी परीक्षा में शामिल हुए एक अभ्यर्थी की मुख्य उत्तरपुस्तिका (आंसरशीट) से चार पन्ने गायब मिलने के मामले में हाई कोर्ट ने आयोग के ऊपर पचास हजार रुपये का अर्थदंड लगाया है। इसके साथ ही माननीय न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि आयोग को यह मुआवजा राशि आगामी तीन महीनों के भीतर अनिवार्य रूप से पीड़ित अभ्यर्थी को अदा करनी होगी।

उत्तरपुस्तिका से पन्ने गायब होने और आरटीआई से हुआ खुलासा

प्राप्त विवरण के अनुसार यह पूरा मामला सीजीपीएससी की एक प्रमुख प्रतियोगी परीक्षा से जुड़ा हुआ है, जिसमें परीक्षा संपन्न होने के पश्चात एक अभ्यर्थी ने अपनी उत्तरपुस्तिका के मूल्यांकन और प्राप्तांकों की सत्यता की जाँच करने के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था। जब आयोग की ओर से उसे उसकी उत्तरपुस्तिका की प्रमाणित फोटोकॉपी उपलब्ध कराई गई, तो उसकी गहनता से जाँच करने पर चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि उस मुख्य आंसरशीट में से कुल चार पृष्ठ गायब थे। सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू यह था कि उन गायब पन्नों पर लगभग तीस अंकों के महत्वपूर्ण प्रश्नों के लिखित उत्तर दर्ज थे, जिनका मूल्यांकन ही नहीं किया गया था और इस बड़ी त्रुटि के कारण अभ्यर्थी का अंतिम परीक्षा परिणाम सीधे तौर पर नकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ था।

हाईकोर्ट में याचिका और न्यायमूर्ति पी.पी. साहू की एकल पीठ का कड़ा रुख

उत्तरपुस्तिका से पन्ने गायब होने की इस गंभीर घटना के बाद जब आयोग के स्तर से कोई भी संतोषजनक प्रतिक्रिया या समाधान नहीं मिला, तो व्यथित होकर अभ्यर्थी ने बिलासपुर उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की। अपनी याचिका में उसने पक्ष रखा कि लोक सेवा आयोग जैसी प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्था की इस लापरवाही के कारण उसका अमूल्य भविष्य दांव पर लग गया है। इस याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति पी.पी. साहू की एकल पीठ के समक्ष संपन्न हुई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सीजीपीएससी की लचर कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए टिप्पणी की कि एक संवैधानिक संस्था से इस स्तर की भारी चूक की कतई अपेक्षा नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी पाया कि जब अभ्यर्थी ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी, तब भी आयोग के जिम्मेदार अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को नहीं समझा और समय पर उचित जाँच पूरी नहीं की। इसी प्रशासनिक लापरवाही और उदासीनता को आधार बनाते हुए न्यायालय ने आयोग पर यह आर्थिक जुर्माना लगाने का ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।