आकिब नबी की प्रेरक कहानी, दोस्त का साथ और पिता का फैसला बना टेस्ट टीम तक पहुंचने की कुंजी

श्रीनगर| भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार और अनुभवी तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह पूरी तरह से फिट न हो पाने के कारण श्रीलंका के खिलाफ आगामी दो मैचों की टेस्ट सीरीज से बाहर हो गए हैं। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने बुमराह के स्थान पर घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करने वाले जम्मू-कश्मीर के युवा तेज गेंदबाज आकिब नबी को भारतीय टेस्ट स्क्वाड में शामिल किया है। हालांकि नबी ने मुख्य टीम में जगह बना ली है, लेकिन यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या उन्हें इस दौरे पर अपना इंटरनेशनल डेब्यू करने का मौका मिलता है या नहीं।

आसान नहीं रहा शीर्ष स्तर तक पहुँचने का सफर

आकिब नबी के लिए क्रिकेट के इस मुकाम तक पहुँचना किसी संघर्ष से कम नहीं रहा है। जब किशोरावस्था में नबी को बीसीसीआई के एक विशेष तेज गेंदबाजी शिविर में भाग लेने का बुलावा आया था, उस वक्त वह अपनी 12वीं बोर्ड परीक्षा (बायो-साइंस विषय) की तैयारी में जुटे थे। उस समय इस राष्ट्रीय शिविर में ऑस्ट्रेलिया के महान तेज गेंदबाज ग्लेन मैकग्रा युवा गेंदबाजों को गेंदबाजी की बारीकियां सिखाने वाले थे।

नबी के पिता गुलाम नबी डार एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और वह शिक्षा को जीवन में सबसे अधिक प्राथमिकता देते थे। वह चाहते थे कि उनका बेटा पूरी तरह पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करे और क्रिकेट के लिए अपनी पढ़ाई बीच में न छोड़े। हालांकि, काफी मान-मनौव्वल के बाद पिता मान गए, और उनका यह फैसला नबी के जीवन का सबसे बड़ा और स्वर्णिम मोड़ साबित हुआ।

पिता को मनाने में दोस्त ने निभाई थी अहम भूमिका

दाएं हाथ के तेज गेंदबाज आकिब नबी ने लगभग 13 साल के लंबे संघर्ष के बाद इतिहास रच दिया है। वह जम्मू-कश्मीर के पहले ऐसे क्रिकेटर बन गए हैं जिन्हें आधिकारिक तौर पर भारत की टेस्ट टीम में चुना गया है। नबी के शुरुआती दिनों के क्लब कप्तान जुबैर डार ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि उनके पिता शुरू में उन्हें बीसीसीआई शिविर में भेजने के बिल्कुल खिलाफ थे, भले ही वहाँ ग्लेन मैकग्रा जैसे दिग्गज कोच मौजूद हों। उनके पिता का तर्क था कि नबी को मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करनी चाहिए। तब जुबैर को बीच में आकर उनके पिता को समझाना पड़ा था कि मैकग्रा से कोचिंग पाने का यह सुनहरा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।

जुबैर बताते हैं कि जब वह नबी के पिता को राजी करने में सफल रहे, तो एक सरकारी शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने अपनी सीमित आय में से करीब 10,000 रुपये का इंतजाम किया और बेटे को ट्रेन के बजाय हवाई जहाज से चेन्नई भेजा ताकि उसका समय बचे। कुछ महीने पहले जब आईपीएल नीलामी में आकिब को एक बड़ा रिकॉर्ड अनुबंध मिला, तो उनके पिता ने उसी पुरानी घटना को याद करते हुए कहा था— “अच्छा हुआ मैंने उस दिन तुम्हारी बात मान ली थी।”

सफलता के बाद भी नहीं बदली आकिब की सादगी

अपने दोस्त की सफलता पर भावुक होते हुए जुबैर ने कहा कि सबसे खास बात यह है कि इतनी बड़ी शोहरत और सफलता मिलने के बाद भी आकिब नबी के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है। वह आज भी बेहद शांत, अपने काम से काम रखने वाले और जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं। आईपीएल कैंप के लिए रवाना होने से ठीक पहले भी वह अचानक अपने पुराने दोस्त जुबैर से मिलने उनके घर पहुँच गए थे, जो उनकी सरलता को दर्शाता है।

बारामूला शहर से लगभग आठ किलोमीटर दूर स्थित छोटे से गाँव शीरी के रहने वाले नबी की सादगी ने पहली ही मुलाकात में लोगों का दिल जीत लिया था। नबी से जुड़ा एक संस्मरण साझा करते हुए जुबैर ने बताया कि शुरुआती दिनों में कश्मीर में केवल श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर स्टेडियम में ही टर्फ विकेट हुआ करता था। एक जिला-स्तरीय मैच खेलने जब वे वहाँ पहुँचे थे, तो नबी ने बेहद मासूमियत से कहा था— “भाई, मैं पूरी रात सो नहीं पाया क्योंकि जीवन में पहली बार शेर-ए-कश्मीर के ऐतिहासिक मैदान पर मैच खेलने जा रहा हूँ।”