दिल्ली। शिवसेना (यूबीटी) नेता आनंद दुबे ने कोलकाता के प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति, गरबा विवाद और हालिया बयानों पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने नेताओं की बयानबाजी पर निशाना साधते हुए कहा कि अबू आसिम आजमी, वारिस पठान और नितेश राणे जैसे नेताओं की भाषा एक जैसी है और ये सभी समाज में नफरत फैलाने की बात करते हैं।
गरबा सनातनियों का पवित्र त्योहार
गरबा विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए आनंद दुबे ने कहा कि गरबा सनातन धर्म का एक पवित्र त्योहार है, जहां माताएं और बहनें मां की प्रतिमा के सामने नृत्य करती हैं। उन्होंने अबू आसिम आजमी के उस बयान का समर्थन किया जिसमें उन्होंने कहा था कि गैर-सनातनियों को गरबा में नहीं जाना चाहिए। दुबे ने तर्क दिया कि जिस इस्लाम धर्म में मूर्ति पूजा की अनुमति नहीं है, वहां ऐसे आयोजनों में शामिल होने का कोई औचित्य नहीं बनता है।
सुवेंदु अधिकारी के मछली खाने पर प्रतिक्रिया
सुवेंदु अधिकारी के मंदिर परिसर में मछली खाने से जुड़े विवाद पर आनंद दुबे ने संतुलन साधने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि धीरेंद्र शास्त्री सनातन के कथावाचक हैं और उनके अनुसार मंदिर परिसर में सात्विक होकर जाना उचित है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर कोई अपनी संस्कृति और परंपरा के तहत मछली खा रहा है या कोई सात्विक रहने की बात कर रहा है, तो दोनों के अपने-अपने तर्क हैं। इसे अनावश्यक रूप से विवादित नहीं बनाया जाना चाहिए।
सनातन धर्म की विशालता और सहिष्णुता
सनातन धर्म की विशेषता बताते हुए शिवसेना नेता ने कहा कि इसमें हर व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत भावना है। किसी को पत्थर में भगवान नजर आते हैं और किसी को भगवान में भी पत्थर दिखाई देता है। यही हिंदुओं की असली खूबसूरती है। हिंदू धर्म इतना विशाल और उदार है कि जो व्यक्ति भगवान को नहीं मानता, वह भी इसके दायरे में आता है। उन्होंने खान-पान की स्वतंत्रता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जीवों का सम्मान होना चाहिए और जिसे जो खाना है वह खाए, यह उसका व्यक्तिगत विषय है, लेकिन दूसरों की भावनाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
ब्रिक्स सम्मेलन और रूस के साथ संबंध
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर बात करते हुए आनंद दुबे ने कहा कि यह भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों का एक महत्वपूर्ण वैश्विक समूह है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भारत के रिश्ते बेहद मजबूत और अच्छे रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि इस तरह के सम्मेलनों में सकारात्मक चर्चाएं होनी चाहिए और देश का मुख्य ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि कूटनीतिक स्तर पर रूस से भारत को क्या-क्या रणनीतिक और आर्थिक लाभ मिल सकते हैं।

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