नई दिल्ली। शर्मिला धनखड़ ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिलाओं के शॉट पुट F57 इवेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश को पैरा एथलेटिक्स का पहला ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाया। 40 साल की उम्र में उन्होंने अपने सीजन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रूप में 9.81 मीटर का थ्रो फेंका। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा एथलेटिक्स के अंदर स्वर्ण पदक जीतने के लिए भारत का दो दशक का लंबा इंतजार आखिरकार समाप्त हो गया है। इसी मुकाबले में रोमांचक घटनाक्रम और तकनीकी समीक्षा के बाद भारत की एक अन्य एथलीट शिल्पा शैला को भी कांस्य पदक से सम्मानित किया गया, जिससे देश की झोली में एक ही स्पर्धा से दो पदक आ गिरे।
विवाद और समीक्षा के बाद शिल्पा को मिला ब्रॉन्ज मेडल
इस इवेंट के दौरान मुकाबला उस समय बेहद दिलचस्प हो गया जब पदक तालिका में नाटकीय बदलाव देखने को मिला। शुरुआत में नाइजीरिया की एथलीट यूचेरिया इयियाजी तीसरे स्थान पर थीं और उन्हें कांस्य पदक मिलने की संभावना थी। परंतु भारतीय दल की तरफ से तुरंत कड़ी आपत्ति दर्ज कराई गई, जिसके बाद आधिकारिक समीक्षा में उनके एकमात्र वैध प्रयास को फाउल करार दिया गया। इस निर्णय के फलस्वरूप चौथे पायदान पर मौजूद भारतीय एथलीट शिल्पा शैला को उनका हक मिला और उन्हें ब्रॉन्ज मेडल दे दिया गया। शिल्पा ने इस प्रतियोगिता में 7.26 मीटर का अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो दर्ज किया था। इस घोषणा के बाद दोनों भारतीय खिलाड़ियों ने मैदान पर बेहद भावुक अंदाज में अपनी इस ऐतिहासिक जीत का जश्न मनाया। F57 श्रेणी मूल रूप से उन खिलाड़ियों के लिए निर्धारित होती है जिनके पैरों में दिव्यांगता, अंगों की कमी या मांसपेशियों की कमजोरी जैसी शारीरिक चुनौतियां होती हैं।
महज दो साल की उम्र में पोलियो से प्रभावित हुई थीं जिंदगी
शर्मिला धनखड़ का जीवन संघर्ष और अदम्य साहस की एक ऐसी दास्तान है जो हर किसी को प्रेरित करती है। उनका जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव में एक बेहद सामान्य किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता खेती-किसानी करते थे जबकि उनकी मां नेत्रहीन थीं। घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी और इसी बीच जब वह महज दो साल की थीं, तब वह पोलियो का शिकार हो गईं। ग्रामीण इलाके में उस समय उचित चिकित्सा सुविधा न मिल पाने के कारण उनका बायां पैर स्थाई रूप से प्रभावित हो गया। हालांकि, इतनी बड़ी शारीरिक चुनौती ने कभी भी उनके बुलंद हौसलों और मजबूत इरादों को डिगा नहीं पाया।
कम उम्र की शादी और दहेज प्रताड़ना का झेलना पड़ा दर्द
शर्मिला की जिंदगी का रास्ता संघर्षों से भरा रहा और मुश्किलें यहीं समाप्त नहीं हुईं। कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई, जिसके बाद उन्हें ससुराल पक्ष की तरफ से दहेज की मांग को लेकर वर्षों तक मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। लगभग 25 वर्ष की आयु में वह अपनी दो मासूम बेटियों का हाथ थामकर हमेशा के लिए ससुराल छोड़कर अपने मायके लौट आईं। इसके पश्चात उनकी मुलाकात अजीत सिंह से हुई और उनके जीवन में एक सकारात्मक मोड़ आया। पति के अटूट समर्थन और पूरे परिवार के सहयोग ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी और यहीं से उन्होंने खेलों की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने का बड़ा निर्णय लिया।
34 वर्ष की उम्र में शुरू किया खेल सफर और रचा इतिहास
खेल जगत में जहां आमतौर पर खिलाड़ी बचपन से ही कड़ी ट्रेनिंग की शुरुआत कर देते हैं, वहीं शर्मिला धनखड़ ने अपनी जिंदगी की दूसरी पारी की शुरुआत 34 वर्ष की आयु में एक एथलीट के रूप में की। उन्होंने F57 वर्ग के तहत शॉट पुट और डिस्कस थ्रो जैसे खेलों में उतरने का फैसला किया और अपनी मेहनत के बल पर बहुत कम समय में देश की शीर्ष पैरा एथलीटों की सूची में खास जगह बना ली। अपनी इस असाधारण मेहनत का परिचय देते हुए उन्होंने वर्ष 2021 की पैरा नेशनल चैंपियनशिप में अपने पदार्पण टूर्नामेंट में ही 7.40 मीटर का बेहतरीन थ्रो फेंककर न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी स्थापित कर दिखाया।

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