नई दिल्ली | वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के परिणामों ने कांग्रेस पार्टी के लिए केवल सीटों की संख्या में ही इजाफा नहीं किया, बल्कि उसकी पूरी राजनीतिक दिशा और दशा को एक नया मोड़ देने का अवसर भी मुहैया कराया है। साल 2014 और 2019 के निराशाजनक दौर के बाद, आखिरकार कांग्रेस एक सशक्त और मुखर विपक्षी ताकत के रूप में संसद और सड़क पर उभरी है। इसके बाद से पार्टी की कार्यशैली और वैचारिक रुख में एक महत्वपूर्ण बदलाव साफ तौर पर देखा जा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के स्थापित राजनीतिक नैरेटिव का उसी पिच और उसी वैचारिक फ्रेम में जवाब देने के बजाय, अब राहुल गांधी और पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार सामाजिक सम्मान, सामाजिक बराबरी, आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी, महिलाओं की स्वतंत्रता और युवाओं के अधिकारों जैसे बुनियादी मुद्दों को एक नए राजनीतिक विमर्श में ढालने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात और हिमाचल प्रदेश समेत आगामी विधानसभा चुनावों वाले तमाम राज्यों में कांग्रेस इसी आक्रामक और सुनियोजित नैरेटिव को जमीन पर उतारने की जुगत में जुटी है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस को अंततः हिंदू ध्रुवीकरण की काट के लिए एक प्रभावी और मु मुकम्मल सियासी विकल्प मिल गया है?
अब एजेंडा तय कर रही कांग्रेस, जवाब देने पर मजबूर भाजपा
वर्ष 2014 के बाद के राजनीतिक परिदृश्य में अमूनन यह देखा गया कि राष्ट्रीय राजनीति का पूरा एजेंडा लगातार भाजपा के इर्द-गिर्द घूमता रहा और भगवा दल ही हर मुद्दे की दिशा तय करता था। हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और धार्मिक पहचान जैसे विषयों पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अक्सर बचाव की मुद्रा में या केवल प्रतिक्रिया (Reaction) देने की स्थिति में नजर आते थे।
लेकिन 2024 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस के रणनीतिकारों ने इस रक्षात्मक चक्रव्यूह को तोड़ने की ठोस कोशिश की है। खासकर 'जातीय जनगणना' और 'आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी' जैसे तीखे सवाल उठाकर पार्टी ने राजनीतिक बहसों के केंद्रबिंदु को ही बदलने का प्रयास किया है। अब इस नई रणनीति का अगला और अहम चरण 'सामाजिक सम्मान' के सवाल से सीधे जुड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ दिनों के भीतर कांग्रेस ने छात्र आंदोलनों के बहाने शिक्षा व बेरोजगारी के संकट, महिला सम्मान व लैंगिक बराबरी, तथा दलितों के साथ होने वाले भेदभाव के गंभीर मुद्दों को आक्रामकता से उठाया है। आने वाले समय में पार्टी द्वारा देश भर में आदिवासी और अल्पसंख्यक सम्मेलनों के जरिए अपनी पकड़ को और मजबूत करने की योजना है।
इस हफ्ते कांग्रेस के एजेंडे में शामिल रहे ये प्रमुख मुद्दे
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हल्द्वानी प्रकरण: उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की विशाल सभा के बाद सामने आए कथित 'शुद्धिकरण विवाद' को पार्टी ने सीधे तौर पर दलितों के अपमान, सम्मान और छुआछूत के बड़े सामाजिक सवाल के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर उठाया।
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पुणे सम्मेलन: महाराष्ट्र के पुणे में महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता के मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर शहरी, शिक्षित और युवा महिला मतदाताओं को अपने पाले में लाने की सशक्त कोशिश की गई।
कांग्रेस का नया राजनीतिक एजेंडा: पाँच स्तंभ
पार्टी ने अपनी आगामी चुनावी रणनीतियों के लिए जिन पांच प्रमुख आधारों को अपना मुख्य हथियार बनाया है, वे इस प्रकार हैं:
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दलितों को सामाजिक सम्मान
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पिछड़ों (OBC) को आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी
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महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता और सुरक्षा
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युवाओं को रोजगार और आगे बढ़ने के अवसर
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आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन के अधिकार
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अल्पसंख्यकों को बराबरी का हक और सुरक्षा का अहसास

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