इबोला वायरस के नए स्ट्रेन को लेकर दुनिया में बढ़ी चिंता, रूस ने पेश किया समाधान

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) सहित अफ्रीकी देशों में कहर बरपा रहे इबोला वायरस के एक नए और बेहद खतरनाक स्ट्रेन के खिलाफ रूस द्वारा नई वैक्सीन (टीका) विकसित किए जाने का दावा किया गया है। अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा और वैश्विक स्वास्थ्य गलियारों में यह खबर एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। वर्तमान में कांगो में इस वायरस के संक्रमण की रफ्तार बेहद डरावनी है, जिसके चलते वहां जनस्वास्थ्य के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।

बढ़ते मामलों और मौतों के इस डरावने सिलसिले को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी वैश्विक स्तर पर अपनी चिंता जाहिर की है। ऐसे संकटपूर्ण समय में रूसी वैज्ञानिकों द्वारा किसी संभावित टीके का आविष्कार किया जाना चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों और स्वतंत्र वैश्विक लैबोरेट्रीज द्वारा अभी तक इस वैक्सीन के असर, सुरक्षा मानकों और इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन को लेकर अंतिम मुहर (पुष्टि) लगाना बाकी है। यदि रूस का यह दावा क्लिनिकल ट्रायल्स में शत-प्रतिशत खरा उतरता है, तो यह वैश्विक महामारी नियंत्रण के इतिहास में एक युगांतरकारी सफलता होगी।

रूसी स्वास्थ्य मंत्रालय का क्या है दावा?

रूसी संघ के स्वास्थ्य मंत्री मिखाइल मुराश्को के आधिकारिक बयान के मुताबिक, उनके देश के शीर्ष वायरोलॉजिस्ट्स ने इबोला के जिस नए टीके को तैयार किया है, वह न केवल वर्तमान स्ट्रेन बल्कि कांगो में तबाही मचा रहे बेहद दुर्लभ और खतरनाक 'बुंदीबुग्यो' (Bundibugyo) स्ट्रेन के खिलाफ भी मानव शरीर में मजबूत प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में पूरी तरह सक्षम है।

अफ्रीका में इमरजेंसी; युगांडा तक फैला संक्रमण

डब्ल्यूएचओ (WHO) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस समय कांगो में इबोला के 900 से अधिक संदिग्ध मरीज मिल चुके हैं, जबकि 220 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध मौत हो चुकी है। इनमें से 101 मामलों और 10 मौतों की आधिकारिक रूप से प्रयोगशालाओं में पुष्टि हो चुकी है। स्थिति की भयावहता को देखते हुए ही बीते 17 मई को इस बीमारी को 'अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल' घोषित किया गया था। चिंता की बात यह है कि यह छूत की बीमारी अब सीमाएं लांघकर पड़ोसी देश युगांडा में भी अपने पैर पसार चुकी है। कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि यह प्रकोप भले ही अभी अपने शुरुआती दौर में हो, लेकिन इसके फैलने की गति बेहद तेज है। विशेषज्ञों के अनुसार, 'बुंदीबुग्यो' स्ट्रेन इबोला के अन्य रूपों की तुलना में थोड़ा कम जानलेवा जरूर है, लेकिन इसे हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।

इबोला के लक्षण और कैसे फैलता है यह वायरस?

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इबोला वायरस मूल रूप से संक्रमित वन्यजीवों (जैसे चमगादड़ या बंदरों) से इंसानों के शरीर में प्रवेश करता है। इसके बाद, यह एक संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों (रक्त, पसीना, लार आदि) के सीधे संपर्क में आने से दूसरे स्वस्थ इंसानों में तेजी से फैलता है। इस बीमारी की औसत मृत्यु दर (मोर्टलिटी रेट) लगभग 50% है, जो इसे दुनिया की सबसे घातक बीमारियों में से एक बनाती है। राहत की बात सिर्फ इतनी है कि यह कोरोना की तरह हवा (एयरबॉर्न) के जरिए नहीं फैलता, लेकिन संक्रमित मरीज की तीमारदारी या इलाज के दौरान जरा सी भी लापरवाही डॉक्टरों और नर्सों को तुरंत अपनी चपेट में ले सकती है।

वायरस का इतिहास: 2014 की उस भयावह त्रासदी की यादें

सन् 1976 में पहली बार पहचान में आए इस वायरस ने साल 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में अब तक की सबसे बड़ी और खौफनाक तबाही मचाई थी। उस दौरान इबोला के कारण जितने लोग संक्रमित हुए और जितनी जानें गईं, वह इतिहास में दर्ज इसके सभी पिछले प्रकोपों के कुल योग से भी कहीं ज्यादा था। उस दौर में भी इस महामारी ने भौगोलिक सीमाओं को तोड़ते हुए गिनी से अपनी शुरुआत की थी और देखते ही देखते सिएरा लियोन और लाइबेरिया जैसे मुल्कों को अपनी जद में लेकर पूरे महाद्वीप को एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट में धकेल दिया था।