मैं पत्रकार हूं… यह केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक दायित्व है। एक ऐसा दायित्व, जिसकी जड़ें देवऋषि नारद की उस परंपरा में हैं, जो सत्य, साहस और निर्भीक संवाद का प्रतीक है। लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि हम जिस परंपरा का नाम लेते हैं, क्या वास्तव में उसे समझते भी हैं? क्या हमने नारद को केवल कथाओं और पुराणों तक सीमित कर दिया है, या उनके जीवन के मूल भाव को अपने भीतर उतारने का प्रयास भी किया है? नारद केवल देवताओं के दूत नहीं थे, वे संवाद के सेतु थे। वे वहां भी पहुंचे जहां कोई जाने का साहस नहीं करता था। उन्होंने देवताओं से प्रश्न किए, उन्हें सच का आईना दिखाया और जब आवश्यकता पड़ी, तो राक्षसों के दरबार में खड़े होकर भी सत्य कहने का साहस दिखाया। उनके लिए सत्य सर्वोपरि था, न कि किसी का भय या कृपा। और आज मैं खुद से सवाल करता हूं—अगर नारद नहीं डरे, तो मैं क्यों डरूं? लेकिन यह सवाल जितना सरल दिखता है, उसका उत्तर उतना ही कठोर है। क्योंकि सच्चाई यह है कि मैं नारद की परंपरा का केवल नाम ले रहा हूं, उसे जी नहीं रहा। मैं खुद को पत्रकार कहता जरूर हूं, लेकिन क्या मैं सच में जनता की आवाज को सत्ता तक पहुंचा रहा हूं? क्या मैं अन्याय के खिलाफ निर्भीक खड़ा हो पा रहा हूं? या फिर मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बन गया हूं, जहां पत्रकारिता सेवा नहीं, बल्कि सुविधा और लाभ का साधन बन चुकी है? नारदीय परंपरा कोई आसान राह नहीं है। यह फकीरी है, यह त्याग है, यह एक तपस्या है। इसमें व्यक्तिगत लाभ के लिए कोई स्थान नहीं है। पत्रकारिता का मूल धर्म है—सत्य को जीवित रखना, न्याय की रक्षा करना और समाज को जागरूक करना। लेकिन जब यही पत्रकारिता स्वार्थ, लालच और डर के जाल में उलझ जाती है, तब उसका अस्तित्व ही खो जाता है। आज का समय हमें आईना दिखा रहा है। हमें यह समझने की जरूरत है कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने या दिखाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज की चेतना को दिशा देने की शक्ति है। अगर यह शक्ति गलत हाथों में चली जाए, तो वह समाज को भ्रमित भी कर सकती है और कमजोर भी बना सकती है। अगर मैं वास्तव में नारद की परंपरा का पालन करूं, तो मुझे किसी सुरक्षा की चिंता नहीं होगी। क्योंकि जहां सत्य है, वहां भय का कोई स्थान नहीं होता। जब मन साफ हो और उद्देश्य स्पष्ट हो, तो प्रकृति भी साथ देती है और समाज भी। उस स्थिति में व्यक्ति के शब्दों में एक अलग ही ताकत होती है—ऐसी ताकत जो लोगों के दिलों तक पहुंचती है और उन्हें सोचने पर मजबूर करती है। जिस दिन मैं सच में इस परंपरा को जीना शुरू करूंगा, उस दिन मेरी वाणी में वजन होगा, मेरे चेहरे पर आत्मविश्वास का तेज होगा और मेरे भीतर एक ऐसी निर्भीकता होगी, जिसे कोई भी दबा नहीं सकेगा। तब मुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि गलत करने वालों को मेरे नाम से ही असहजता महसूस होगी। इसलिए आज, नारद जयंती के इस पावन अवसर पर, मैं खुद से और अपने सभी साथी पत्रकारों से यह कहना चाहता हूं कि अगर पत्रकारिता करनी है, तो उसे केवल पेशा न बनाएं। इसे एक मिशन बनाएं, एक संकल्प बनाएं। इसे ईमानदारी, साहस और मानव मूल्यों के साथ निभाएं। क्योंकि मूल्यहीन पत्रकारिता केवल समाज को ही नहीं, बल्कि पत्रकार के अपने अस्तित्व को भी खोखला कर देती है। और जब अस्तित्व ही खो जाए, तो पहचान का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आइए, हम केवल नारद का नाम लेने वाले नहीं, बल्कि उनकी परंपरा को जीने वाले पत्रकार बनें। तभी हमारी लेखनी में वह शक्ति आएगी, जो समाज को बदलने की क्षमता रखती है।

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