September 13, 2026

शिक्षा व्यवस्था की बदहाली: कचरा शेड में पढ़ने को मजबूर मासूम, जिम्मेदार बेखबर

पखांजूर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कंदाड़ी ग्राम पंचायत के आश्रित गांव बोगानघोड़िया से सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को उजागर करने वाली एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहां आदिवासी और ग्रामीण अंचल के मासूम बच्चे एक ऐसी जगह बैठकर शिक्षा ग्रहण करने को विवश हैं, जिसे ग्राम पंचायत ने कचरा पृथकीकरण (कचरा डंप और छांटने) के उद्देश्य से बनाया था। शिक्षा विभाग भले ही कागजों और दीवारों पर "बाल देवो भवः" जैसे आदर्श वाक्य लिखकर बच्चों को भगवान का रूप बताता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस सुदूर बीहड़ गांव में इन नौनिहालों को कचरा शेड के नीचे बैठकर अपना भविष्य गढ़ना पड़ रहा है।

जर्जर स्कूल भवन बना जान का खतरा, मरम्मत की गुहार बेअसर

इस अव्यवस्था के पीछे की मुख्य वजह प्रशासनिक उदासीनता है। बोगानघोड़िया के शासकीय प्राथमिक शाला में पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक कुल 10 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन स्कूल का मूल भवन पिछले कई वर्षों से अत्यंत जर्जर और खंडहरनुमा हो चुका है। इस भवन की छत का प्लास्टर और कंक्रीट अक्सर अचानक टूटकर गिरता रहता है, जिससे हर वक्त किसी बड़े हादसे का डर बना रहता है। स्थानीय ग्रामीणों और शिक्षकों ने इस गंभीर समस्या को लेकर कई बार शिक्षा विभाग के अधिकारियों तथा क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को लिखित आवेदन देकर नए भवन की मांग की, परंतु लंबे समय के बाद भी शासन-प्रशासन के किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने इसकी सुध लेना उचित नहीं समझा।

वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कचरा शेड में आंगनबाड़ी और स्कूल शिफ्ट

जब जर्जर स्कूल भवन में बैठना बच्चों के लिए जानलेवा साबित होने लगा, तो शिक्षकों ने विवश होकर बच्चों की सुरक्षा के लिए एक वैकल्पिक रास्ता चुना। उन्होंने शासकीय प्राथमिक शाला और शासकीय आंगनबाड़ी केंद्र दोनों को ही गांव के कचरा फेंकने वाले शेड में स्थानांतरित कर दिया। अब भीषण गर्मी, कड़ाके की ठंड और बरसात के थपेड़ों के बीच मासूम बच्चे इसी असुरक्षित टीन की छत वाले कचरा शेड में बैठकर क ख ग घ सीखने को मजबूर हैं। यह स्थिति उन दावों की पोल खोलती है जो अंदरूनी और आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए बड़े-बड़े मंचों से किए जाते हैं।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र के बच्चों के हौसले बुलंद, पर तंत्र लाचार

नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन इस गांव के बच्चों की किस्मत में अब भी वही असुरक्षित और तंग कचरा शेड लिखा है। सबसे सुखद और हैरान करने वाली बात यह है कि इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बच्चों और उनके अभिभावकों में पढ़ाई को लेकर भारी उत्साह है। इस बीहड़ गांव के बच्चे बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा करना चाहते हैं। सालों से नक्सली दंश झेल रहे इस क्षेत्र के प्रति सरकार की यह बेरुखी व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। अब देखना यह है कि गूंगा-बहरा बना यह सिस्टम कब जागता है और कब इन बच्चों को एक सुरक्षित पाठशाला नसीब होती है।