भेड़ पालन से आत्मनिर्भर बने बस्तर के सुरेन्द्र, ग्रामीण उद्यमिता की बने मिसाल

रायपुर :  कम लागत और कम देखभाल में शुरू किया जाने वाला भेड़ पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए आय का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। इससे मांस, ऊन और खाद (जैविक उर्वरक) के रूप में वर्षभर लगातार मुनाफा प्राप्त होता है। इसके लिए महंगे आवास या अत्यधिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती, परिवार के बुजुर्ग या बच्चे भी इनकी देखभाल आसानी से कर सकते हैं।

भेड़ पालन आय का सशक्त माध्यम

           परंपरागत खेती के साथ आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का समन्वय किसानों की आर्थिक तस्वीर बदल रहा है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन के माध्यम से बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड के ग्राम तोंगकोंगेरा निवासी प्रगतिशील किसान सुरेन्द्र देवांगन ने भेड़ पालन को आय का सशक्त माध्यम बनाकर ग्रामीण उद्यमिता की प्रेरक मिसाल प्रस्तुत की है। आज उनका भेड़ पालन व्यवसाय न केवल परिवार की आय का प्रमुख स्रोत बन चुका है, बल्कि रोजगार सृजन, प्राकृतिक खेती और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है।

आधुनिक प्रशिक्षण से मिली नई दिशा

       सुरेन्द्र देवांगन ने भेड़ पालन शुरू करने से पहले वैज्ञानिक पद्धति से इसकी जानकारी प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसके लिए वे उत्तरप्रदेश के मथुरा जाकर आधुनिक पशुपालन का प्रशिक्षण लेकर आए। प्रशिक्षण में लगभग 20 से 25 हजार रुपए खर्च हुए, लेकिन वहीं से प्राप्त तकनीकी ज्ञान ने उनके व्यवसाय की मजबूत नींव रखी। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने पशुपालन विभाग के माध्यम से राष्ट्रीय पशुधन मिशन के अंतर्गत आवेदन किया।

सरकारी सहायता से शुरू हुआ 28 लाख रुपए का उद्यम

         करीब 28 लाख रुपए की लागत वाली परियोजना के लिए सुरेन्द्र को राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत 10 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ, जबकि शेष राशि के लिए उन्होंने 15 लाख रुपए का बैंक ऋण लिया। उन्होंने 100 मादा और 5 नर सहित कुल 105 भेड़ों के साथ इस व्यवसाय की शुरुआत की। बेहतर देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन के कारण आज उनके फार्म में भेड़ों की संख्या बढ़कर लगभग 136 तक पहुंच चुकी है।

वैज्ञानिक प्रबंधन से बढ़ा उत्पादन और लाभ

         सुरेन्द्र ने अपनी पांच एकड़ भूमि में लगभग 2,100 वर्गफीट क्षेत्र में आधुनिक एवं हवादार शेड का निर्माण कराया है। शेड को चार अलग-अलग भागों में विभाजित किया गया है, जिससे नवजात मेमनों, मादा, नर और बड़े पशुओं की अलग-अलग देखभाल सुनिश्चित हो सके। इस वैज्ञानिक व्यवस्था से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है और संक्रमण का खतरा भी कम होता है।

बाजार की मांग के अनुरूप हो रही बिक्री

          बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए सुरेन्द्र भेड़ों का विपणन करते हैं। वर्तमान में नर भेड़ लगभग 480 रुपए प्रति किलो तथा मादा भेड़ लगभग 400 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रही है। 15 से 16 किलोग्राम वजन होने पर व्यापारी सीधे उनके फार्म पहुंचकर खरीदारी करते हैं। शुरुआती वर्ष में पशुधन विस्तार पर ध्यान देने के कारण बिक्री सीमित रही, लेकिन पिछले दो वर्षों में वे तीन लाख रुपए से अधिक मूल्य की भेड़ों की बिक्री कर चुके हैं।

खेती में भी मिला दोहरा लाभ

        भेड़ पालन का सकारात्मक प्रभाव उनकी खेती पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। भेड़ों से प्राप्त जैविक खाद के उपयोग से मक्का और धान की फसलों की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब उन्हें यूरिया और डीएपी जैसी महंगी रासायनिक खाद पर खर्च नहीं करना पड़ता, जिससे खेती की लागत में कमी आई है और भूमि की उर्वरता भी बनी हुई है।

दो ग्रामीणों को मिला रोजगार

         अपने भेड़ पालन केंद्र के संचालन के लिए सुरेन्द्र ने दो स्थानीय चरवाहों को रोजगार उपलब्ध कराया है। इससे न केवल उनका व्यवसाय सुचारू रूप से संचालित हो रहा है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी सृजित हुए हैं।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता परिवार

          सुरेन्द्र देवांगन नियमित रूप से बैंक ऋण की किश्तें जमा कर रहे हैं तथा चरवाहों का वेतन भी समय पर दे रहे हैं। उनकी बड़ी बेटी आईटीआई की पढ़ाई पूरी कर चुकी है, जबकि छोटी बेटी दसवीं कक्षा में अध्ययनरत है। उनका विश्वास है कि बैंक ऋण चुकता होने के बाद इस व्यवसाय से होने वाला लाभ उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ बनाएगा।