नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) का 14वां साल किसी राजनीतिक त्रासदी से कम नहीं लग रहा है। एक ऐसी पार्टी, जिसका जन्म 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के पवित्र आंदोलन की कोख से हुआ था, आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। यह महज एक पार्टी का टूटना नहीं है, बल्कि उस 'आदर्शवाद' की नींव का हिलना है, जिस पर अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की इमारत खड़ी की थी।
वो दौर: जब फर्श पर सोते थे केजरीवाल
आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में शामिल और पार्टी के पूर्व नेता मयंक गांधी ने अपनी किताब 'आप एंड डाउन' (AAP & Down) में उस दौर की यादें साझा की हैं, जो आज के चकाचौंध भरे दौर में किसी स्वप्न जैसी लगती हैं।
मयंक गांधी एक किस्सा याद करते हुए लिखते हैं: "एक बार आधी रात को मैं प्रशांत भूषण के मयूर विहार स्थित घर पहुंचा, जिसका उपयोग पार्टी के कार्यकर्ता किया करते थे। वहां मैंने देखा कि अरविंद केजरीवाल जमीन पर एक पतली सी चादर बिछाकर सो रहे थे। जब मैं पहुंचा, तो उन्होंने उठकर मेरा हाल-चाल पूछा। जब मैंने पूछा कि मैं कहाँ सोऊं, तो उन्होंने अपनी चादर के एक तरफ हाथ थपथपाया और कहा— 'यहीं सो जाओ'।"
आज जब आम आदमी पार्टी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, तो 'फर्श पर सोने' वाले केजरीवाल और 'बदले हुए' परिदृश्य के बीच का यह फासला हैरान कर देता है।
जब अन्ना हज़ारे से थी सीधी टक्कर
पार्टी बनाने का निर्णय केजरीवाल के लिए आसान नहीं था। मयंक गांधी की किताब और तत्कालीन घटनाक्रमों के अनुसार, केजरीवाल का एक ही लक्ष्य था—अन्ना हज़ारे का आशीर्वाद। लेकिन राह में कई रोड़े थे।
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सीताराम जिंदल का हस्तक्षेप: अन्ना हज़ारे जब जिंदल फार्म्स में स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे, तब वहां के सीताराम जिंदल ने अन्ना को राजनीतिक पार्टी बनाने के खिलाफ सलाह दी थी। जिंदल की बातों का असर ऐसा हुआ कि अन्ना ने मीडिया में बयान दे दिया कि अरविंद को पार्टी नहीं बनानी चाहिए।
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वो भावुक मुलाक़ात: केजरीवाल हार मानने वालों में से नहीं थे। वे और प्रशांत भूषण अन्ना को मनाने जिंदल फार्म्स पहुंचे। जब अन्ना का मिजाज गर्म था और वे किसी भी हाल में सुनने को तैयार नहीं थे, तब केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई और विनम्रता से बात शुरू की थी: "अन्ना जी, हम दिल्ली से आए हैं, कम से कम पानी तो पिला दीजिए।"
केजरीवाल का तर्क था कि ओपिनियन पोल्स और जनता की राय पार्टी बनाने के पक्ष में है। उन्होंने अन्ना को यह याद दिलाने की कोशिश की थी कि आप हमेशा 'जनता की बात सुनने' की वकालत करते हैं।
14 साल बाद: क्या खोया और क्या पाया?
आज जब पार्टी के सात बड़े सांसद एक साथ दल बदलकर भाजपा में शामिल हो गए हैं, तो वही केजरीवाल, जो कभी अन्ना हज़ारे की इजाजत के बिना एक कदम नहीं उठाना चाहते थे, आज अपनी ही पार्टी को बिखरते हुए देख रहे हैं।
'आप' का यह पतन केवल सीटों का नुकसान नहीं है, बल्कि यह उन पुराने साथियों के मोहभंग की कहानी भी है, जिन्होंने कभी केजरीवाल की सादगी को अपना आदर्श माना था। मयंक गांधी की किताब आज एक आईने की तरह है, जो दिखाती है कि जिस आंदोलन ने देश को उम्मीद दी थी, वह समय के साथ अपने मूल सिद्धांतों से कितना दूर आ गया है।
क्या यह केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का टकराव है, या फिर 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' की उस पुरानी भावना का पूरी तरह से अंत? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन अरविंद केजरीवाल के लिए यह 14वां साल सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बन गया है।

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