November 4, 2026

KGMU केस में पुख्ता सबूत और गवाह, फिर भी पुलिस ने क्यों नहीं की कार्रवाई?

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में सामने आए बहुचर्चित धर्मांतरण एवं शोषण प्रकरण में उत्तर प्रदेश विशेष कार्य बल (एसटीएफ) की गहन जांच के बाद कई पुख्ता सुबूत और तथ्य सामने आ चुके हैं। इस सनसनीखेज मामले में पीड़ित पक्ष और गवाहों के सामने आने के बावजूद अब तक प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज न किए जाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में केवल आगामी विभागीय बैठकों में रिपोर्ट प्रस्तुत करने और दोषी पाए जाने वाले चिकित्सकों व अन्य कर्मचारियों के विरुद्ध सामान्य विभागीय कार्रवाई तक सीमित रहने की बात कह रहा है, जिससे इस बात पर बहस छिड़ गई है कि आखिर आरोपियों को कड़ी कानूनी कार्रवाई से क्यों बचाया जा रहा है।

एसटीएफ की जांच रिपोर्ट और गंभीर आरोप

मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन द्वारा एसटीएफ को सौंपी गई जांच का दायरा चार दिन पूर्व सार्वजनिक कर दिया गया था। इस रिपोर्ट में केजीएमयू में वर्तमान में कार्यरत और कुछ पूर्ववर्ती चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ तथा अन्य कर्मचारियों की संलिप्तता पूरी तरह उजागर हुई है। जांच में प्रत्येक आरोपी की भूमिका को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है, जिसमें धर्मांतरण कराने, कट्टरपंथी विचारधारा का सुनियोजित प्रचार-प्रसार करने तथा कुछ युवतियों के साथ दुष्कर्म करने तक के संगीन तथ्य शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि इतने गंभीर आरोप होने के बावजूद आपराधिक मुकदमा दर्ज न होना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

तेरह डॉक्टरों समेत पच्चीस लोगों की संदिग्ध भूमिका

एसटीएफ की विस्तृत रिपोर्ट में तेरह चिकित्सकों सहित लगभग पच्चीस व्यक्तियों की भूमिका को अत्यंत संदिग्ध और गंभीर पाया गया है। इनमें से कई ऐसे लोग भी हैं जो अब केजीएमयू छोड़कर अन्य संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि इस पुख्ता जांच रिपोर्ट के आधार पर संस्थान प्रशासन को तत्काल खुद आगे आकर कानूनी मुकदमा दर्ज कराना चाहिए था, ताकि इस पूरे षड्यंत्र की जड़ तक पहुँचकर इसमें शामिल सभी चेहरों को बेनकाब किया जा सके। जैसे-जैसे यह रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है, सोशल मीडिया पर भी इसकी चर्चाएं तेज हो गई हैं और तमाम लोग केजीएमयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में लंबे समय से चल रही ऐसी गतिविधियों पर गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।

छात्राओं को फंसाने का षड्यंत्र और ब्लैकमेलिंग का जाल

जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि केजीएमयू में सक्रिय इस गिरोह की जड़ें काफी गहरी थीं और मुख्य आरोपी डॉ. रमीज तथा उसके सहयोगी केवल लखनऊ ही नहीं बल्कि प्रदेश के अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी पैर पसारे हुए थे। ये आरोपी विशेष रूप से गैर-मुसलिम छात्राओं को अपने जाल में फंसाते थे और एक छात्रा के माध्यम से उसकी सहेलियों पर दबाव डलवाकर उन्हें अपने संपर्क में लाते थे। बाद में छात्राओं के बीच आपसी फूट डालकर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता था। ठाकुरगंज क्षेत्र में एक पीड़िता की अपनी पूर्व परिचित से हुई आकस्मिक मुलाकात के दौरान इस बात का खुलासा हुआ था कि आरोपी ने उसका भी धर्मांतरण कराकर निकाह किया है। इसके अलावा, हस्साम नामक आरोपी 'कार्डियो सेवा फाउंडेशन' की आड़ में फर्जीवाड़ा चलाते हुए छात्राओं को मेडिकल कैंपों के बहाने गुमराह करता था, जिसके वित्तीय खातों और डिजिटल साक्ष्यों की भी पुलिस द्वारा गहनता से पड़ताल की जा रही है।