कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के निर्णायक मोड़ पर केंद्र सरकार का यह फैसला राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और चुनावी स्थिरता को लेकर एक बड़ा संकेत है। 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान और 4 मई की मतगणना से ठीक पहले प्रशासन में निरंतरता बनाए रखने के लिए डीजीपी सिद्ध नाथ गुप्ता का सेवा विस्तार अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

1. सिद्ध नाथ गुप्ता के सेवा विस्तार का महत्व
कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा 30 अप्रैल 2026 के बाद छह महीने का सेवा विस्तार देने के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:
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प्रशासनिक निरंतरता: चुनाव के बीच में डीजीपी जैसे शीर्ष पद पर बदलाव से सुरक्षा व्यवस्था और समन्वय प्रभावित हो सकता था।
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चुनाव आयोग का भरोसा: सिद्ध नाथ गुप्ता को चुनाव आयोग ने ही नियुक्त किया था, इसलिए मतगणना (4 मई) और उसके बाद की संभावित स्थितियों को संभालने के लिए उनकी मौजूदगी को आवश्यक माना गया।
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अनुभव: 1992 बैच के अधिकारी होने के नाते उनके पास राज्य की कानून-व्यवस्था का व्यापक अनुभव है।
2. 'पोस्ट-पोल वायलेंस' को रोकने की तैयारी
गृह मंत्री अमित शाह का बयान कि केंद्रीय बल (CAPF) चुनाव के बाद भी एक सप्ताह तक तैनात रहेंगे, पश्चिम बंगाल के पिछले चुनावी इतिहास (हिंसा की घटनाओं) को देखते हुए दिया गया है:
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सुरक्षा कवच: चुनाव के बाद अक्सर होने वाली राजनीतिक झड़पों को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।
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मतदाताओं में विश्वास: मतगणना के दौरान और नतीजों के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखना सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है।
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सख्त संदेश: गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि बलों की मौजूदगी का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल की मदद करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और शांतिपूर्ण माहौल सुनिश्चित करना है।

4. राजनीतिक प्रभाव
डीजीपी का कार्यकाल बढ़ाना और केंद्रीय बलों की लंबी तैनाती पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तीखी हो सकती हैं:
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भाजपा का रुख: इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम बता रही है।
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विपक्ष (टीएमसी): इस पर सवाल उठा सकती है कि क्या यह राज्य प्रशासन के अधिकारों में हस्तक्षेप है।

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