शिवसेना कार्यकर्ताओं में उत्सुकता, MLC चुनाव से पहले उद्धव-शिंदे एकता पर सवाल

छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद): महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े उलटफेर के संकेत मिलने लगे हैं। 2 जून 2026 को समृद्धि एक्सप्रेस-वे पर उद्धव ठाकरे गुट के कद्दावर नेता अंबादास दानवे और एकनाथ शिंदे गुट के मंत्री अब्दुल सत्तार का काफिला अचानक आमने-सामने आ गया। इस दौरान दोनों नेताओं ने न सिर्फ गाड़ी से उतरकर एक-दूसरे को गले लगाया, बल्कि दोनों ओर से पुरानी शिवसेना को फिर से एक करने की वकालत भी की गई। अंबादास दानवे ने जहां कहा कि अब दोनों शिवसेना के एक होने का वक्त आ गया है, वहीं अब्दुल सत्तार ने भी जवाब दिया कि अगर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे हरी झंडी दे दें, तो दोनों पार्टियां तुरंत एक हो सकती हैं।

आखिर चर्चा में क्यों है दोनों नेताओं की यह मुलाकात?

महाराष्ट्र में 18 जून को विधान परिषद (MLC) की सीटों पर चुनाव होने जा रहे हैं। इस चुनाव से ठीक पहले दोनों गुटों के नेताओं की इस नजदीकी और गठबंधन की चर्चा के पीछे दो मुख्य वजहें मानी जा रही हैं:

1. MLC चुनाव के कारण बढ़ी अंदरूनी खींचतान

महायुति गठबंधन में संभाजीनगर-जालना विधान परिषद सीट को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। भाजपा ने इस पारंपरिक शिवसेना सीट पर सुहास शिरसाट को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है, जबकि शिंदे गुट इस सीट पर अपना मजबूत दावा ठोक रहा था। अविभाजित शिवसेना का मजबूत गढ़ रही औरंगाबाद-जालना सीट पर भी भाजपा द्वारा प्रत्याशी उतारे जाने से शिंदे गुट के कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी देखी जा रही है।

2. भाजपा के बढ़ते राजनैतिक प्रभाव की चिंता

उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे, दोनों ही खेमों के नेताओं को अब यह डर सताने लगा है कि भाजपा धीरे-धीरे राज्य में अपने क्षेत्रीय सहयोगी दलों की राजनैतिक जमीन पर कब्जा करती जा रही है। दोनों गुटों के नेताओं ने खुले तौर पर माना है कि भाजपा का यह बढ़ता प्रभाव उनके अस्तित्व के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। नेताओं का मानना है कि अगर वे अब भी अलग-अलग रहे, तो आने वाले समय में उनकी क्षेत्रीय ताकत बेहद कमजोर हो जाएगी।

जमीनी कार्यकर्ताओं को सिर्फ हाईकमान के आदेश का इंतजार

चार साल पहले दोफाड़ हुई शिवसेना के फिर से एक होने की उम्मीदों पर दोनों ही गुटों के जमीनी कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं। एकनाथ शिंदे के करीबी और नासिक के जिलाध्यक्ष अजय बोरास्ते का कहना है कि महाराष्ट्र का हर शिवसैनिक दिल से चाहता है कि दोनों गुट फिर से एक हो जाएं क्योंकि दोनों ही तरफ बालासाहेब ठाकरे के आदर्शों को मानने वाले लोग हैं। वहीं दूसरी तरफ, उद्धव गुट के नेता प्रथमेश गीते का कहना है कि महाराष्ट्र में शिवसेना हमेशा से नंबर वन पार्टी रही है और अगर सभी लोग दोबारा एक साथ आ जाते हैं, तो पार्टी मजबूती से चुनाव लड़ पाएगी।

शिवसैनिकों के बीच क्यों बढ़ रही है छटपटाहट?

पार्टी कार्यकर्ताओं की इस छटपटाहट के पीछे सबसे बड़ी वजह संभाजीनगर-जालना सीट पर टिकट का न मिलना है। शिंदे गुट यहां से सिल्लोड के विधायक अब्दुल सत्तार के बेटे समीर सत्तार को मैदान में उतारना चाहता था, लेकिन भाजपा के दबाव के आगे उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी। हालांकि, विरोध जताते हुए समीर सत्तार ने निर्दलीय पर्चा भी भर दिया था, लेकिन बाद में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। कार्यकर्ताओं का मानना है कि भले ही वे सत्ता में गठबंधन के साथी हैं, लेकिन टिकट बंटवारे में केवल भाजपा की मर्जी चल रही है, जिससे कभी शिवसेना के गढ़ रहे औरंगाबाद नगर निगम और जिला परिषद जैसे प्रमुख निकायों पर भाजपा का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।

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