नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने शिवसेना (यूबीटी) की उस याचिका पर विचार करने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी है, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा पार्टी के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह में विलय को मंजूरी देने के निर्णय को चुनौती दी गई है। इसके साथ ही अदालत ने लोकसभा सचिवालय तथा संबंधित सांसदों को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस प्रेषित किया है। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मामले पर संज्ञान लेते हुए प्रतिवादियों से उत्तर तलब किया है तथा अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है। इससे पूर्व संसद के सत्र से ठीक पहले लोकसभा अध्यक्ष ने इन सांसदों के विलय को मान्यता प्रदान की थी, जिससे निचले सदन में शिंदे गुट के सदस्यों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
कानूनी प्रक्रिया और न्यायालय का रुख
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने अदालत के समक्ष मामले का शीघ्र उल्लेख करते हुए इस पर त्वरित सुनवाई का आग्रह किया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ के सामने विषय रखे जाने के बाद मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। याचिका में तर्क दिया गया है कि जनमत के विपरीत जाकर राजनीतिक दलों में शामिल होने की यह प्रवृत्ति दलबदल विरोधी नियमों के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और इस पर न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और सांसदों का कदम
विगत लोकसभा चुनावों में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट के चुनाव चिह्न पर कुल नौ प्रत्याशी विजयी होकर संसद पहुंचे थे। हालाँकि, इनमें से छह सांसदों ने बाद में मूल दल से अलग होकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के समर्थित दल का रुख कर लिया। शिवसेना (यूबीटी) ने अध्यक्ष के समक्ष इन सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने की माँग उठाई थी, परंतु अध्यक्षीय निर्णय के तहत उनके विलय को वैध ठहरा दिया गया, जिसके खिलाफ अब सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया गया है।
संविधान और दलबदल कानून पर बहस
अदालत में दायर याचिका में यह मुख्य बिंदु उठाया गया है कि बागी सांसदों पर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल विरोधी कानून लागू होना चाहिए। याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि चुनाव जीतने के पश्चात विरोधी विचार वाले राजनीतिक दलों में शामिल होना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल नहीं है। अब देखना होगा कि दो सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय लोकसभा सचिवालय और संबंधित सांसदों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले जवाबों पर क्या रुख अपनाता है।

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