देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं में गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और प्रकृति संरक्षण का अद्भुत संगम माना जाता है. यहां सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार गंगा दशहरा के अवसर पर घरों की चौखट पर विशेष द्वार पत्र लगाया जाता है. मान्यता है कि यह पत्र घर को बुरी नजर, नकारात्मक शक्तियों, आग, चोरी और आकाशीय बिजली जैसी प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखता है. कुमाऊं के गांवों में आज भी यह परंपरा उतनी ही श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाती है, जितनी वर्षों पहले निभाई जाती थी.
गंगा दशहरा के इस विशेष द्वार पत्र को आकर्षक ज्यामितीय आकृतियों और रंग-बिरंगे डिजाइनों से सजाया जाता है. पत्र के बीच में एक वृताकार चक्र बनाया जाता है, जिसे पेंसिल और परकार की सहायता से तैयार किया जाता है. इसके बाद इसमें हरे, पीले और लाल रंगों से सुंदर सजावट की जाती है. वृत के बाहर पांच ऋषियों अगस्त्य, पुलस्त्य, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्त के नाम लिखे जाते हैं. साथ ही इसमें “वज्र निवारक मंत्र” अंकित किया जाता है, जिसे अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है.
हाथों से तैयार किया जाता है द्वार पत्र
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंत्र घर को वज्रपात, अग्नि दुर्घटना और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है. यही कारण है कि कुमाऊं अंचल के लगभग हर गांव में गंगा दशहरा पर यह परंपरा विशेष उत्साह के साथ निभाई जाती है. पहले इन पत्रों को प्राकृतिक रंगों से तैयार किया जाता था. दाड़िम, अखरोट, बुरांश और किलमोड़ जैसे पेड़-पौधों से रंग बनाकर इन पत्रों को सजाया जाता था, लेकिन समय के साथ अब बाजार में मिलने वाले वाटर कलरों का इस्तेमाल बढ़ गया है. कुमाऊं में ब्राह्मण समाज गंगा दशहरा से पहले इन द्वार पत्रों को हाथों से तैयार कर अपने यजमानों को वितरित करता है. पर्व के दिन लोग सुबह नदी, नौले या अन्य जल स्रोतों में स्नान करते हैं और घर लौटकर विधि-विधान से द्वार पत्र को मुख्य दरवाजे की चौखट के ऊपर स्थापित करते हैं. लोगों का विश्वास है कि यह पत्र पूरे वर्ष घर की रक्षा करता है और सुख-समृद्धि बनाए रखता है.
इस वजह से मनाया जाता है दशहरा
इस साल गंगा दशहरा का पर्व 25 मई 2026, सोमवार को मनाया जाएगा. ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस दिन दशमी तिथि अगले दिन सुबह 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगी, जबकि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र अगले दिन प्रातः 4 बजकर 9 मिनट तक रहेगा. वहीं चंद्रमा सुबह 6 बजकर 7 मिनट तक सिंह राशि में रहकर बाद में कन्या राशि में प्रवेश करेगा. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को ही मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था.
कहा जाता है कि राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं, लेकिन उनके तीव्र वेग को संभालना धरती के लिए संभव नहीं था. तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में समाहित कर उनके वेग को नियंत्रित किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया. यही कारण है कि गंगा दशहरा को जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक भी माना जाता है.
अनोखी है कुमाऊं में निभाई जाने वाली ये परंपरा
कुमाऊं की यह अनोखी परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें प्रकृति, जल स्रोतों और पर्यावरण के संरक्षण का संदेश भी देती है. आधुनिकता के इस दौर में भी जब गांवों की चौखट पर रंग-बिरंगे द्वार पत्र सजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो सदियों पुरानी संस्कृति आज भी जीवित होकर लोगों के जीवन में सुरक्षा और विश्वास का भाव भर रही हो.

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