October 6, 2026

चांद पर बनेगा न्यूक्लियर पावर प्लांट! अमेरिका, चीन और रूस की बड़ी तैयारी

वाशिंगटन। भारत जैसे विकासशील देशों में ऊर्जा उत्पादन के लिए भले ही अभी तक पर्याप्त संख्या में परमाणु रिएक्टरों का विकास नहीं किया जा सका हो, लेकिन अंतरिक्ष की दुनिया में अमेरिका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियां अब धरती की सीमा लांघकर चंद्रमा पर न्यूक्लियर पावर रिएक्टर स्थापित करने की महात्वाकांक्षी योजना पर तेजी से काम कर रही हैं। इसके पीछे मुख्य तर्क यह दिया जा रहा है कि चांद की सतह पर लंबे समय तक टिकने वाले अंतरिक्ष मिशनों को निरंतर और भरोसेमंद ऊर्जा मिलती रहे। अमेरिका जहां साल 2030 तक चांद पर परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की जुगत में है, वहीं रूस और चीन आपसी सहयोग से यह लक्ष्य साल 2036 तक हासिल करने की फिराक में हैं। इस मची होड़ ने अंतरिक्ष कानूनों और भूभागीय अधिकारों को लेकर भी एक नया भू-राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।

चाँद पर परमाणु ऊर्जा की अनिवार्यता और अंतरिक्ष एजेंसियों की योजनाएं

चंद्रमा पर स्थायी बेस स्थापित करने, वहां के प्राकृतिक संसाधनों की खोज करने और अंतरिक्ष में आगे के अभियानों को सुचारू रूप से समर्थन देने के लिए एक अटूट और भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत की सख्त आवश्यकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पिछले दिनों एक ऐसे अत्याधुनिक परमाणु रिएक्टर को तैयार करने के लिए आधिकारिक नोटिस जारी किया था जो अंतरिक्ष की लंबी यात्रा के दौरान पूरी तरह सुरक्षित रह सके और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास बिना किसी नियमित मानवीय रखरखाव के लंबे समय तक काम कर सके। नासा का मुख्य लक्ष्य इसे दिसंबर 2030 तक लॉन्चिंग के लिए पूरी तरह तैयार करने का है। दूसरी ओर, रूस अपने सहयोगी चीन के साथ मिलकर एक गोपनीय योजना के तहत 'सेलेना' नामक चंद्र परमाणु रिएक्टर विकसित करने में जुटा हुआ है। इसे वर्ष 2036 तक क्रियान्वित करने का लक्ष्य तय किया गया है, जिसके जरिए चीन के नेतृत्व वाले भावी लूनर स्टेशनों को निर्बाध बिजली आपूर्ति देने की योजना है। चांद पर रातें पृथ्वी के हिसाब से दो सप्ताह से भी अधिक लंबी होती हैं, जिसके कारण केवल सौर ऊर्जा पैनलों पर पूरी तरह निर्भर रहना असंभव है। परमाणु रिएक्टर सूर्य की रोशनी के बिना भी भारी मात्रा में बिजली पैदा कर सकते हैं। नासा का प्रस्तावित 'लूनर रिएक्टर-1' लगभग 20 किलोवाट बिजली पैदा करने और पांच साल तक बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के काम करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है, जबकि रूस का 'सेलेना' रिएक्टर 10 किलोवाट बिजली और करीब एक दशक तक स्वायत्त रूप से संचालन करने में सक्षम होगा।

अंतरिक्ष कानून और क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर खड़े हुए नए विवाद

चांद पर परमाणु ऊर्जा स्थापित करने की इस वैश्विक दौड़ ने अंतरिक्ष कूटनीति और कानूनों से जुड़े कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। वर्ष 1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' के प्रावधानों के अनुसार दुनिया का कोई भी देश चंद्रमा की जमीन पर अपना प्रत्यक्ष क्षेत्रीय अधिकार या स्वामित्व नहीं जता सकता है। हालांकि, भविष्य में लूनर बेस के चारों ओर सुरक्षा क्षेत्र (सेफ्टी ज़ोन) बनाने और वहां दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों की गतिविधियों को सीमित करने का मुद्दा आने वाले समय में बड़े भू-राजनीतिक विवाद का कारण बन सकता है। अमेरिकी रक्षा विश्लेषकों और रणनीतिकारों को इस बात की गहरी आशंका है कि चीन और रूस का संयुक्त परमाणु रिएक्टर किसी खास चंद्र क्षेत्र को प्रतिबंधित जोन में तब्दील कर सकता है, जिससे अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों और उनके रोवर्स की आवाजाही व अनुसंधान कार्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में ऐसे सामरिक सुरक्षा क्षेत्र बनाए जाते हैं, तो उन्हें अंतरिक्ष में सभी देशों की मुक्त पहुंच के स्थापित सिद्धांत के साथ संतुलन बिठाकर ही आगे बढ़ाना होगा ताकि अंतरिक्ष का बाजारीकरण और सैनिकीकरण नियंत्रण से बाहर न हो।