नई दिल्ली। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में 7 अप्रैल 2026 का दिन एक बड़े संवैधानिक बदलाव का गवाह बनने जा रहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ उन जटिल और व्यापक कानूनी सवालों पर सुनवाई शुरू करेगी, जिनका सीधा असर हिंदू, मुस्लिम, पारसी और दाऊदी बोहरा समुदायों की धार्मिक प्रथाओं पर पड़ना तय है। यह मामला केवल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह एक ऐसी बड़ी बहस बन चुका है जो व्यक्तिगत अधिकारों और धार्मिक स्वायत्तता के बीच की रेखा स्पष्ट करेगा।
अदालत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि क्या किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार किसी समुदाय के सामूहिक धार्मिक अधिकारों से ऊपर हो सकते हैं। इस सुनवाई का प्रभाव मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, गैर-पारसी व्यक्ति से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर में प्रवेश के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथाओं की वैधता पर भी पड़ेगा। गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी, तब कोर्ट ने कहा था कि भक्ति को लैंगिक आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता। हालांकि, 2019 में कोर्ट ने महसूस किया कि इस मुद्दे के तार कई अन्य धर्मों की प्रथाओं से भी जुड़े हैं, जिसके बाद इसे बड़ी बेंच को भेज दिया गया था।
सीजेआई सूर्य कांत के नेतृत्व वाली इस नई बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना सहित देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के अनुभवी जज शामिल हैं। पीठ मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या करेगी। अदालत यह देखेगी कि धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है और इसमें प्रयुक्त नैतिकता शब्द का अर्थ संवैधानिक नैतिकता है या सामाजिक। साथ ही, यह भी तय किया जाएगा कि क्या अदालतें यह निर्धारित करने का अधिकार रखती हैं कि कोई प्रथा किसी धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं। इस मामले में अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कई जैन संगठनों ने भी हस्तक्षेप किया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जो प्रथाएं महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं, उन्हें धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना जा सकता। वहीं, धार्मिक संस्थाओं का कहना है कि धर्म की अपनी आंतरिक स्वायत्तता होती है और सदियों पुरानी परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। 7 अप्रैल से शुरू होने वाली यह दैनिक सुनवाई तय करेगी कि भविष्य का भारत संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक मान्यताओं के बीच कैसा संतुलन बनाएगा।

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