नई दिल्ली। नेपाल में सभी प्राइवेट स्कूलों को पूरी तरह बंद करने की खबर सच नहीं है। पिछले कुछ दिनों से भारत में सोशल मीडिया पर खबर चल रही हैं कि नेपाल में सभी प्राइवेट स्कूलों को बंद कर दिया जाएगा और सवाल यह भी किए जा रहे थे कि क्या भारत में भी प्राइवेट स्कूलों को लेकर ऐसा फैसला लिया जा सकता है? पड़ताल में सामने आया कि नेपाल सरकार शिक्षा सुधार के तहत प्राइवेट स्कूलों की मनमानी रोकने की तैयारी कर रही है, बंद करने का ऐसा कोई आदेश सामने नहीं आया है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल में मुख्य फोकस अवैध रूप से वसूली गई फीस वापसी, सरकारी नियमों के पालन पर है। सरकारी शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कोचिंग सेंटरों पर लगाम लगाने और 5वीं कक्षा तक की परंपरागत परीक्षाएं खत्म करने पर है। नेपाल में स्कूलों से जुड़ी खबरों में सामने आया कि नेपाल के शिक्षा मंत्रालय ने प्राइवेट स्कूलों को तय सीमा से ज्यादा फीस न लेने की चेतावनी दी है। अभिभावकों ने एडमिशन और सालाना शुल्क में मनमानी की शिकायतें की हैं, खासकर नए सत्र के समय।
मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि सत्र शुरू होने के बाद ही प्रवेश लिया जाए। साथ ही कोचिंग सेंटरों की मनमानी पर भी रोक लगाने की कोशिश हुई है। सरकार ने 5वीं तक पारंपरिक परीक्षाएं खत्म कर दी है और अब बच्चों का मूल्यांकन वैकल्पिक व मनोवैज्ञानिक तरीकों से किया जाएगा, ताकि सीखने का माहौल तनावमुक्त बन सके। प्राइवेट स्कूलों की ऐक्शन कमिटी के अध्यक्ष, भरत अरोड़ा ने कहा कि प्राइवेट स्कूलों को बंद करना कोई समाधान नहीं है।
बता दें दिल्ली में 2 हजार से ज्यादा प्राइवेट स्कूल हैं। सीबीएसई के देश में 35 हजार स्कूल हैं, जिसमें से आधे से भी ज्यादा प्राइवेट हैं। प्राइवेट स्कूल भारत के राष्ट्र निर्माण में स्वतंत्रता के समय से ही एक सशक्त सहयोगी रहे हैं। शिक्षा में इनोवेशन, गुणवत्ता और व्यापक अवसरों को बढ़ावा देते है। संस्थान सामाजिक उत्तर दायित्व को भी सुदृढ़ करते हैं। फीस का मुद्दा है तो देश में हर राज्य के ऐक्ट के हिसाब से नियम लागू किए जाते हैं। निजी और सरकारी स्कूलों के बीच गुणवत्ता का बड़ा अंतर और सरकारी व्यवस्था की गिरावट इसकी मुख्य वजह है। जहां फीस, किताबें और यूनिफॉर्म महंगी होती है। प्री-प्राइमरी शिक्षा अब भी अनियमित है, जिससे जवाबदेही की कमी है। नीति जरूरी है।

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