मुंबई। महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने सरकारी अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों के बीच शिष्टाचार के नियमों (प्रोटोकॉल) में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया है। मंगलवार, 28 अप्रैल को जारी एक नए सरकारी प्रस्ताव (GR) के अनुसार, अब राज्य के अधिकारियों के लिए उन विधायकों या सांसदों के सम्मान में खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा, जो किसी मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं या किसी जांच के सिलसिले में सरकारी दफ्तर पहुंचे हैं।
क्या है नया नियम?
मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल द्वारा हस्ताक्षरित इस आदेश ने 20 नवंबर, 2025 के पुराने निर्देशों को संशोधित कर दिया है। नए नियमों के तहत निम्नलिखित स्थितियों में अधिकारियों को विशेष प्रोटोकॉल (खड़े होकर अभिवादन करना) देने की आवश्यकता नहीं है:
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दोषी जनप्रतिनिधि: यदि किसी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में न्यायालय द्वारा दोषी ठहराया गया हो।
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जांच और सुनवाई: यदि जनप्रतिनिधि को किसी सरकारी कार्यालय में अपीलकर्ता, पक्षकार या जांच के घेरे में आने वाले व्यक्ति के रूप में बुलाया गया है।
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चुनावी प्रक्रिया: यदि वे नामांकन पत्र दाखिल करने, दस्तावेजों की जांच-पड़ताल या चुनाव से जुड़ी किसी सुनवाई के लिए दफ्तर में मौजूद हैं।
"इन विशिष्ट परिस्थितियों में अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनप्रतिनिधियों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा एक आम नागरिक के साथ किया जाता है।" — सरकारी प्रस्ताव (GR)
निष्पक्षता बनाए रखने की पहल
सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यह बदलाव जांच प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति जांच का सामना कर रहा है और अधिकारी उसके सम्मान में खड़ा होता है, तो इससे दूसरे पक्ष को यह संदेश जा सकता है कि अधिकारी किसी दबाव में है या पक्षपात कर रहा है। इससे सुनवाई के परिणाम प्रभावित होने का खतरा रहता है।
सामान्य प्रोटोकॉल रहेगा बरकरार
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम केवल विशेष परिस्थितियों (अपराध/जांच/चुनाव) पर लागू होता है। सामान्य कामकाज के लिए आने वाले अन्य विधायकों और सांसदों के लिए पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे:
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अभिवादन: अधिकारियों को उनके आने और जाने पर खड़े होकर सम्मान देना होगा।
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सौहार्दपूर्ण व्यवहार: जनप्रतिनिधियों के साथ सम्मानपूर्वक और शिष्ट ढंग से पेश आना अनिवार्य है।
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पत्राचार: जनप्रतिनिधियों द्वारा लिखे गए पत्रों का जवाब अधिकतम दो महीने के भीतर देना अधिकारियों के लिए अनिवार्य बना रहेगा।
यह कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि कानून के सामने पद से ज्यादा 'न्याय' की गरिमा सर्वोपरि है।

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