ओबीसी आरक्षण मामले में सुनवाई का नया चरण शुरू, डिवीजन बेंच गठित

जबलपुर। मध्य प्रदेश में लंबे समय से सियासी और कानूनी खींचतान का केंद्र बने 27 फीसदी ओबीसी (OBC) आरक्षण मामले में आज (मंगलवार, 16 जून 2026) जबलपुर हाईकोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और 90 दिनों के भीतर अंतिम फैसला सुनाने के निर्देश के बाद अब इस पूरे मामले की सुनवाई के लिए गठित की गई नई डिवीजन बेंच आज दोपहर 2:30 बजे से इन याचिकाओं पर नियमित सुनवाई शुरू करेगी।

इस नई डिवीजन बेंच में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस भगवती प्रसाद शर्मा शामिल हैं, जिनके सामने आरक्षण के पक्ष और विपक्ष की दलीलें रखी जाएंगी।

क्या है पूरा विवाद और 50% की कानूनी सीमा?

मध्य प्रदेश में यह कानूनी लड़ाई साल 2019 से चल रही है, जब तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का फैसला किया था।

  • 50% का नियम टूटा: इस बढ़ोतरी के बाद राज्य में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और ओबीसी (OBC) का कुल आरक्षण मिलाकर 63 फीसदी (और ईडब्ल्यूएस मिलाकर कुल 73 फीसदी) तक पहुंच गया।

  • हाईकोर्ट की रोक: सुप्रीम कोर्ट के 'इंदिरा साहनी मामले' के ऐतिहासिक फैसले के मुताबिक, कुल आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती। इसी आधार पर सामान्य वर्ग के याचिकाकर्ताओं ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद अदालत ने बढ़ी हुई 13 फीसदी नियुक्तियों पर रोक (होल्ड) लगा दी थी।

  • 86 याचिकाएं लंबित: वर्तमान में इस मामले से जुड़ी कुल 86 याचिकाएं हाईकोर्ट में लंबित हैं। सरकार फिलहाल '87-13 फॉर्मूले' के तहत भर्तियां कर रही है, जिसमें 13 फीसदी पदों के परिणाम कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रोककर रखे गए हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं को हटाने से खड़ा हुआ था विवाद

इस सुनवाई से ठीक पहले पिछले महीने राज्य सरकार के एक अप्रत्याशित फैसले ने राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी थी। सरकार ने ओबीसी आरक्षण केस में मजबूती से पैरवी कर रहे अपने दो विशेष अधिवक्ताओं—रामेश्वर सिंह ठाकुर और एडवोकेट विनायक प्रसाद शाह को अचानक पद से हटा दिया था। राज्यपाल की मंजूरी के बाद इसकी आधिकारिक अधिसूचना भी जारी की गई थी। इस कदम के बाद सरकार की कानूनी रणनीति और मंशा पर बागी और विपक्ष के नेताओं ने कई सवाल खड़े किए थे।

विरोधी पक्ष की दलील: '50 फीसदी का बैरियर नहीं तोड़ा जा सकता'

पिछली सुनवाई के दौरान आरक्षण का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं की ओर से देश के दिग्गज कानूनविद् और सीनियर एडवोकेट अमर लेखी ने वर्चुअली जुड़कर मजबूत दलीलें पेश की थीं।

  • उन्होंने अदालत के सामने तर्क दिया कि संविधान के तहत स्थापित 50 फीसदी की आरक्षण सीमा को किसी भी स्थिति में लांघा नहीं जा सकता।

  • उन्होंने पूर्व के महाजन कमीशन की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें तकनीकी विशेषज्ञों की कमी थी और वे निर्णय राजनीतिक झुकाव पर आधारित थे।

याचिकाकर्ताओं के वकील दिव्यवीर सिंह के मुताबिक, चूंकि अब सभी पक्षकार ऑनलाइन और हाइब्रिड मोड के जरिए अदालत में उपस्थित हो रहे हैं, इसलिए कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तारीखों को आगे बढ़ाने के बजाय आज (16 जून) से ही इस पर त्वरित और मैराथन सुनवाई करने का फैसला किया है। आज दोपहर बाद होने वाली इस सुनवाई पर प्रदेश के लाखों सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों और राजनीतिक दलों की नजरें टिकी हुई हैं।