भोपाल। कम बारिश की चुनौती से जूझ रहे मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच अब पानी और बिजली का एक नया अंतरराज्यीय समझौता आकार लेता दिख रहा है। गुजरात को आगामी रबी सीजन की खेती और अन्य आवश्यकताओं के लिए जल आपूर्ति की दरकार है, जबकि मध्य प्रदेश को अतिरिक्त बिजली की जरूरत है। इसी स्थिति को देखते हुए दोनों राज्य एक-दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिए 'पानी के बदले बिजली' के पुराने तंत्र को आधार बनाने पर विचार कर रहे हैं। इस प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मध्य प्रदेश अपने प्रमुख बांधों से गुजरात को जल उपलब्ध कराएगा, जिसके बदले में गुजरात से बिजली मिलेगी।
सौराष्ट्र और कच्छ में जलसंकट गहराया
कम बारिश का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ इलाकों पर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य के लगभग 20 जिलों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। देवभूमि द्वारका जिले में औसतन 73 फीसदी कम वर्षा दर्ज की गई है। आगामी रबी फसलों—विशेष रूप से गेहूं और चने की सिंचाई और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति बनाए रखना गुजरात सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने भी पुष्टि की है कि गुजरात सरकार पड़ोसी राज्यों से जल आपूर्ति हासिल करने के विकल्पों पर विचार कर रही है।
मध्य प्रदेश को मिलेगी अतिरिक्त बिजली
पानी की कमी से जूझ रहे गुजरात की मदद के साथ मध्य प्रदेश भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की तैयारी में है। वर्तमान समझौते के तहत गुजरात पहले से ही मध्य प्रदेश को प्रतिदिन 57 से 114 मेगावाट बिजली उपलब्ध करा रहा है। अब जल आपूर्ति के एवज में बिजली की मात्रा और समयावधि बढ़ाने पर चर्चा चल रही है। इससे मध्य प्रदेश को पीक ऑवर्स के दौरान बिजली की कमी से निपटने में मदद मिलेगी।
मध्य प्रदेश के पश्चिमी जिलों में भी कम वर्षा
गुजरात को पानी देने के प्रस्ताव के बीच मध्य प्रदेश के अपने जल स्रोतों की स्थिति भी चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार, इस मानसून सीजन में मध्य प्रदेश में औसतन 908.4 मिमी (35.8 इंच) बारिश हुई, जो सामान्य औसत 949.5 मिमी (37.4 इंच) से करीब 4 प्रतिशत कम है। पश्चिमी मध्य प्रदेश के जिलों—जैसे इंदौर, उज्जैन, धार, झाबुआ, बड़वानी, खंडवा, मंदसौर, नीमच और सीहोर में औसतन 9 से 51 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई है। ऐसे में अपने घरेलू, कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी का संतुलन बनाए रखना मध्य प्रदेश के लिए भी चुनौती होगी।
प्रस्तावित समझौते की शर्तें रहेंगी अहम
यह अंतरराज्यीय जल-बिजली विनिमय दोनों राज्यों के लिए एक व्यावहारिक समाधान साबित हो सकता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जल आपूर्ति की कुल मात्रा, निष्कासन बिंदु (बांध) और बदले में मिलने वाली बिजली की दरें व शर्तें किस प्रकार तय की जाती हैं। मुख्यमंत्रियों के स्तर पर होने वाली आगामी उच्चस्तरीय वार्ता के बाद ही इस समझौते के औपचारिक स्वरूप और शर्तों की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

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