नई दिल्ली। दुनिया के मुकाबले भारतीय संसद में महिलाओं की कम भागीदारी, आरक्षण बिल गिरने से लगा बड़ा झटका लगा है। यह घटनाक्रम केवल राजनीतिक खींचतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने वैश्विक मंच पर महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भारत की कमजोर स्थिति को एक बार फिर उजागर कर दिया है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारतीय संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 15 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई है, जबकि दुनिया का औसत प्रतिनिधित्व 26 से 27 प्रतिशत के बीच पहुंच चुका है। इसका सीधा अर्थ यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद भारत महिलाओं को नीति-निर्माण की मुख्यधारा में जोड़ने के मामले में वैश्विक औसत से काफी पीछे पायदान पर खड़ा है।
दुनिया के अन्य देशों से तुलना की जाए तो स्थिति और भी चिंताजनक नजर आती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन दशकों में दुनिया भर में महिला सांसदों की संख्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। 1995 में जो वैश्विक औसत मात्र 11 प्रतिशत था, वह आज बढ़कर 27.5 प्रतिशत तक जा पहुँचा है। रवांडा जैसे देश ने इस दिशा में मिसाल कायम की है, जहाँ निचले सदन में महिला सदस्यों की संख्या लगभग 64 प्रतिशत है। इसके अलावा क्यूबा, निकारागुआ और बोलिविया जैसे देशों ने भी 50 प्रतिशत से अधिक की भागीदारी सुनिश्चित कर ली है। करीब 30 देश ऐसे हैं जहाँ महिला सांसदों का प्रतिशत 40 से अधिक है। विकसित क्षेत्रों की बात करें तो यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह हिस्सेदारी 33 प्रतिशत और लैटिन अमेरिका में 37 प्रतिशत तक है। भारत इन विकसित देशों ही नहीं, बल्कि कई पड़ोसी और विकासशील देशों से भी पिछड़ रहा है।
मौजूदा भारतीय संसद की तस्वीर देखें तो 542 सदस्यों वाली लोकसभा में इस समय केवल 78 महिलाएँ हैं, जबकि 224 सदस्यों वाली राज्यसभा में उनकी संख्या महज 24 है। जानकारों का मानना है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत यदि 33 प्रतिशत आरक्षण लागू हो जाता, तो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में अचानक बड़ी वृद्धि होती। इससे न केवल सामाजिक न्याय और लैंगिक समानता के मुद्दे मजबूत होते, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर महिला दृष्टिकोण को प्रभावी स्थान मिलता। विपक्षी दलों के विरोध के चलते बिल का गिरना भारत के उस संकल्प को कमजोर करता है, जिसमें वह स्वयं को विकसित राष्ट्र बनाने और वैश्विक मानकों पर खरा उतरने का दावा करता है। बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति और आरक्षण जैसे ठोस कदमों के, इस विशाल लैंगिक अंतर को भर पाना आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।

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