वाशिंगटन : यूएस-ईरान शांति समझौते और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के दोबारा खुलने की खबर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में 4 प्रतिशत से ज्यादा की भारी गिरावट आई है। ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी क्रूड दोनों के दाम प्रति बैरल 3 से 4 डॉलर तक टूट चुके हैं। वैश्विक बाजार के इस रुख को देखते हुए हर किसी के मन में यही सवाल है: क्या भारत में पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?
इसका सीधा जवाब 'हाँ, लेकिन कुछ शर्तों के साथ' है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर होने वाले असर को हम इन 3 मुख्य बिंदुओं से समझ सकते हैं:
भारतीय तेल कंपनियों को बड़ी राहत
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80-85% कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटने से भारतीय तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) की कच्चे माल की लागत काफी कम हो जाएगी। जब कंपनियों की लागत घटेगी, तो वे इसका फायदा आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल के दाम घटाकर दे सकती हैं।
तेल बाजार को स्थिर होने में लगेगा वक्त
भले ही कच्चे तेल के दाम तुरंत गिर गए हैं, लेकिन बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले करीब 4 महीनों से पश्चिम एशिया में जो युद्ध चल रहा था, उसने ग्लोबल सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। समुद्री रास्तों और आपूर्ति प्रणालियों को पूरी तरह सामान्य और स्थिर होने में अभी कुछ हफ़्तों या महीनों का समय लग सकता है। इसलिए, घरेलू बाजार में कीमतों में बड़ी कटौती तुरंत होने के बजाय धीरे-धीरे देखने को मिल सकती है।
सरकारी नीतियां और टैक्स का गणित
भारत में पेट्रोल-डीजल की अंतिम कीमत सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस पर लगने वाली सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, राज्यों के वैट (VAT) और तेल कंपनियों के मुनाफे के मार्जिन पर भी तय होती है।
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अगर कच्चे तेल की कीमतें $80 प्रति बैरल के आसपास या उससे नीचे टिकी रहती हैं, तो सरकार और तेल कंपनियों के पास ₹3 से ₹5 प्रति लीटर तक की कटौती करने का अच्छा मौका होगा।
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हालांकि, अगर सरकार इस गिरावट के बदले टैक्स बढ़ा देती है, तो आम जनता को मिलने वाली राहत सीमित हो सकती है।
निष्कर्ष: यदि अगले कुछ दिनों (विशेषकर 19 जून को होने वाले आधिकारिक हस्ताक्षर के बाद) यह शांति समझौता पूरी तरह लागू रहता है और कच्चे तेल के दाम स्थिर रहते हैं, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में गिरावट की पूरी संभावना है।

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