गया। केनार गांव के पारंपरिक बर्तन निर्माताओं का कारोबार अब समाप्ति के कगार पर पहुंच चुका है। कभी हथौड़ों की गूंज और बर्तनों की चमक से गुलजार रहने वाला यह क्षेत्र आज संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है।
इतिहास में सिमटती पारंपरिक कला
केनार गांव की ख्याति कभी कांसा, तांबा और पीतल के बर्तनों के निर्माण के लिए दूर-दूर तक थी। यहां निर्मित होने वाले बर्तन देश के महानगरों जैसे मुंबई और कोलकाता तक भेजे जाते थे। हालांकि, आधुनिक बाजारों में मशीनों से तैयार सस्ते उत्पादों के प्रवेश ने इस पारंपरिक उद्योग की कमर तोड़ दी है।
घटता दायरा और सिमटता कारोबार
स्थानीय कारीगर रतन साव के अनुसार, पूर्व में इस क्षेत्र के लगभग अस्सी परिवारों की आजीविका इसी कार्य पर निर्भर थी। वर्तमान समय में बढ़ती महंगाई और वित्तीय संकट के चलते यह व्यवसाय मात्र कुछ ही घरों तक सीमित रह गया है।
संसाधनों की कमी से जूझते शिल्पकार
कारीगर सरजू साव कसेरा का कहना है कि पर्याप्त पूंजी और आधुनिक उपकरणों के अभाव में जीवनयापन करना कठिन हो गया है। कई अनुभवी कारीगरों को अपनी आजीविका चलाने के लिए अन्य काम या फेरी लगाने जैसे विकल्प चुनने पड़ रहे हैं।
नई पीढ़ी का मोहभंग
कारीगर धर्मेंद्र कुमार कसेरा बताते हैं कि अधिक परिश्रम और अल्प आय के कारण युवा वर्ग इस पुश्तैनी हुनर से दूर होता जा रहा है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह प्राचीन कला इतिहास का हिस्सा बन जाएगी।
सरकारी सहायता की उम्मीद
केनार के शिल्पकार अब प्रशासनिक और सरकारी मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। उनका मानना है कि उचित वित्तीय सहायता, आधुनिक मशीनरी और बेहतर बाजार मिलने पर इस सांस्कृतिक विरासत और रोजगार को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

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