कोटा। मेडिकल कॉलेज के जेके लोन अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को चढ़ाए गए रक्त से एचआईवी संक्रमण फैलने का गंभीर आरोप लगा है। इस शिकायत के बाद मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। हालांकि, ब्लड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग ने उनके यहां से सप्लाई किए गए रक्त में किसी भी तरह की खराबी या संक्रमण होने की बात को सिरे से खारिज कर दिया है। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन ने बताया कि जिला कलेक्टर कार्यालय से मिले शिकायती पत्र के आधार पर तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई है। इस कमेटी में पीडियाट्रिक विभाग की प्रो. अमृता मयंगर, ब्लड बैंक के विभागाध्यक्ष डॉ. परमेंद्र पचौरी और डॉ. मनीष बोहरा को शामिल किया गया है, जिनकी रिपोर्ट के बाद ही स्थिति साफ होगी।
परिजनों का आरोप और दो मामले आए सामने
इस मामले में कोटा की रहने वाली एक 8 वर्षीय थैलेसीमिया पीड़ित बच्ची के परिजनों ने आरोप लगाया है कि जेके लोन अस्पताल में नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान उनकी बेटी संक्रमित हुई है। परिजनों के अनुसार, साल 2023 की जांच में बच्ची एचआईवी नेगेटिव थी, लेकिन हाल ही में करवाई गई रिपोर्ट में वह पॉजिटिव आई है। इसके अलावा, एक अन्य मामला बूंदी के रहने वाले 13 वर्षीय किशोर का सामने आया है, जो थैलेसीमिया के इलाज के दौरान एचआईवी संक्रमित पाया गया है। विशेष बात यह है कि इस किशोर के मजदूर माता-पिता की रिपोर्ट पूरी तरह नेगेटिव आई है, जिससे परिजनों का शक अस्पताल की व्यवस्थाओं पर गहरा गया है।
अन्य अस्पतालों में इलाज और संक्रमण के विविध कारण
ब्लड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. परमेंद्र पचौरी का कहना है कि दोनों ही पीड़ित बच्चों ने कोटा के अलावा अन्य शहरों जैसे जयपुर और बूंदी के स्थानीय अस्पतालों में भी लंबे समय तक इलाज कराया है। एचआईवी संक्रमण केवल ब्लड ट्रांसफ्यूजन से ही नहीं, बल्कि संक्रमित सुई (नीडल), सिरिंज या ड्रिप चढ़ाने के दौरान हुई किसी लापरवाही से भी फैल सकता है। अक्सर मरीज के परिजन यह स्पष्ट नहीं करते कि उन्होंने पूर्व में किन-किन जगहों से और किस तरह का उपचार लिया है, इसलिए जांच पूरी होने से पहले सीधे तौर पर जेके लोन अस्पताल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
नेट तकनीक से जांच और सुरक्षित ब्लड का दावा
जेके लोन अस्पताल की अधीक्षक डॉ. निर्मला शर्मा ने मामले की विस्तृत जानकारी के लिए ब्लड बैंक विभाग को अधिकृत बताया है। वहीं, डॉ. पचौरी ने अस्पताल के ब्लड बैंक की सुरक्षा प्रणाली का बचाव करते हुए कहा कि यहां थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को दिए जाने वाले रक्त की जांच सबसे अत्याधुनिक न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (NAT) तकनीक से की जाती है। यह फोर्थ जनरेशन की बेहद सटीक जांच प्रणाली है, जो रक्त में कुछ ही दिन पुराने संक्रमण को भी पकड़ लेती है। इस तकनीक के उपयोग के चलते अस्पताल से जारी खून से संक्रमण फैलने की गुंजाइश न के बराबर है और अब आम मरीजों को भी यही सुरक्षित रक्त दिया जा रहा है।

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