नई दिल्ली । भारतीय सेना की भविष्य की रणनीति में स्वदेशी ‘जोरावर’ लाइट टैंक अहम भूमिका निभाने वाला है। ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में संचालन के लिए विकसित टैंक पूर्वी लद्दाख और हिमालयी सीमाओं पर चीन की सैन्य चुनौती को जबाव देगा। खास बात यह है कि इस रिकॉर्ड समय में विकसित किया गया है और अब यह भारतीय सेना की आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बनकर उभर रहा है।
बीते कुछ वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के साथ बढ़े तनाव के बाद सेना ने इसतरह के हल्के और अत्याधुनिक टैंक की आवश्यकता महसूस की थी, जो ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से काम कर सके। इस आवश्यकता को ध्यान में रखकर ‘जोरावर’ परियोजना शुरू की गई। इसका नाम डोगरा सेना के प्रसिद्ध सेनापति जनरल जोरावर सिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्हें ‘लद्दाख का विजेता’ भी कहा जाता है।
करीब 25 टन वजनी यह टैंक कम ऑक्सीजन वाले इलाकों में भी संचालन करने में सक्षम है। इसमें 105 मिमी की शक्तिशाली राइफल्ड तोप लगी है, जो दुश्मन के बंकरों, सैन्य वाहनों और टैंकों को लंबी दूरी से निशाना बना सकती है। इसके अलावा यह गाइडेड मिसाइल दागने की क्षमता भी रखता है। आधुनिक सेंसर, उन्नत फायर कंट्रोल सिस्टम और ड्रोन-रोधी तकनीक इसे और अधिक घातक बनाती है।
जोरावर की एक बड़ी विशेषता इसकी उच्च गतिशीलता है। इस पहाड़ी, बर्फीले और दलदली इलाकों में तेज़ी से तैनात किया जा सकता है। टैंक में ऐसी तकनीक भी शामिल की गई है जो इसकी गर्मी और ध्वनि के संकेतों को कम करती है, जिससे दुश्मन के निगरानी उपकरणों के लिए इस पहचानना कठिन हो जाता है। इसके साथ सुसाइड ड्रोन और आधुनिक निगरानी क्षमताओं को जोड़ने की भी योजना है।
दूसरी ओर, भारत ने बीते तीन दशकों में रूस से बड़ी संख्या में टी-90 टैंक खरीदे और उनका देश में निर्माण भी शुरू किया। इससे रूसी रक्षा उद्योग को बड़ा सहारा मिला था। अब भारत में टी-90 के स्वदेशी उत्पादन ने गति पकड़ ली है और हाल ही में 1000वां टैंक तैयार किया गया है। हालांकि, ‘जोरावर’ के आगमन के साथ भारतीय सेना की विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता और कम होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह टैंक भारत की पर्वतीय रक्षा क्षमता को नई मजबूती देगा और सीमावर्ती क्षेत्रों में रणनीतिक बढ़त सुनिश्चित करेगा।

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