नई दिल्ली। बदलते दौर में मौसम का मिजाज एक अनसुलझी पहेली बनता जा रहा है। सर्दियों का समय लगातार घट रहा है, जबकि गर्मियों का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। मानसून के आने का समय अब निश्चित नहीं रह गया है; कभी यह देरी से आता है, तो कभी आने के बावजूद उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं होती।
देश के किसी हिस्से में रिकॉर्ड तोड़ बरसात बाढ़ ला देती है, तो कहीं लोग सूखे से जूझने लगते हैं। इस वर्ष भी मानसून और वर्षा के आगमन को लेकर संशय बना हुआ है। इसी गंभीर विषय पर मौसम और जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ महेश पलावत (उपाध्यक्ष, स्काईमेट वेदर) से हुई बातचीत के प्रमुख अंश नीचे दिए गए हैं:
इस साल मानसून की सुस्त रफ्तार का कारण
मानसून की गति को तेज करने के लिए बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र (लो-प्रेशर एरिया) बनना अनिवार्य होता है, जो इस बार शुरुआती दौर में नहीं बन सका। इसके साथ ही, हिंद महासागर से आने वाली ‘सोमालिया जेट स्ट्रीम’ हवाएं भी कमजोर बनी हुई हैं। हालांकि, अब उम्मीद है कि 28-29 जून के आस-पास बंगाल की खाड़ी में एक नया सिस्टम सक्रिय होगा। इसके बावजूद, दिल्ली में जुलाई के पहले हफ्ते से पहले मानसून के दस्तक देने के आसार बेहद कम हैं।
क्या जुलाई और अगस्त में पूरी हो पाएगी बारिश की कमी?
इसकी संभावना काफी कम दिखाई दे रही है। इस साल का 'अल-नीनो' इतिहास के सबसे असरदार और मजबूत अल-नीनो में से एक है। इसका सीधा प्रभाव मानसून की रफ्तार पर पड़ेगा, जिसके कारण जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीनों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जा सकती है। हालांकि, इस बीच कुछ दिनों के लिए तेज बारिश के दौर जरूर आएंगे। मुमकिन है कि जुलाई-अगस्त में बारिश का आंकड़ा सामान्य के करीब पहुंच जाए, लेकिन जून महीने में हुई कमी की पूरी भरपाई होना नामुमकिन लगता है।
मौसम के इस असंतुलन की मुख्य वजह
यह संकट केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया इस दौर से गुजर रही है। दिल्ली में सर्दियों का सीजन छोटा होता जा रहा है और मानसून बेपटरी हो चुका है। इसका सबसे बड़ा कारण 'पश्चिमी विक्षोभ' (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) के चक्र में आया बदलाव है। जो विक्षोभ पहले अक्टूबर-नवंबर में आते थे, वे अब खिसककर दिसंबर-जनवरी में आ रहे हैं और गर्मियों (अप्रैल-मई) तक सक्रिय रहते हैं। यह पूरी तरह से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम है।
प्रशासनिक स्तर पर कहां रह जाती है कमी?
दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी ठोस योजना के विकसित हुआ है। यहाँ की सीवेज लाइनें पूरी तरह अवरुद्ध हैं और उनमें प्लास्टिक का कचरा भरा पड़ा है। नतीजा यह होता है कि महज 40 मिलीमीटर की बारिश में ही पूरी दिल्ली पानी-पानी हो जाती है और सड़कें जाम हो जाती हैं। नियमतः मई के महीने में ही ड्रेनेज की सफाई पूरी हो जानी चाहिए। जब भी मौसम एजेंसियां 'रेड अलर्ट' जारी करें, तो नगर निगम को जलभराव वाले इलाकों में पहले से वाटर-पंप तैनात रखने चाहिए। दुर्भाग्य से, प्रशासन और मौसम विभागों के बीच तालमेल की भारी कमी के कारण ऐसा नहीं हो पाता।
अचानक होने वाली भारी बारिश और सुरक्षा के उपाय
जब भी तीन अलग-अलग दिशाओं (उत्तर भारत, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर) से आने वाली हवाएं आपस में टकराती हैं, तो अचानक बेहद तेज बारिश (बादल फटने जैसी स्थिति) का खतरा पैदा हो जाता है। मौसम विज्ञानियों को इस तरह के सिस्टम का पता 24 से 48 घंटे पहले चल जाता है और इसकी चेतावनी तुरंत प्रशासन को भेज दी जाती है। इस तरह की आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए प्रशासन को इन चेतावनियों पर बिना समय गंवाए तुरंत एक्शन मोड में आ जाना चाहिए।

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