पूजा के बाद दीया कब तक जलना चाहिए? घी और तेल में से क्या है बेहतर

जब हम पूजा पाठ करते हैं तो उस दौरान देवी और देवता के लिए दीया जलाते हैं. कुछ विशेष पूजा में अखंड दीपक जलाते हैं, जबकि दैनिक व्रत और पूजा पाठ में सामान्य दीया जलाते हैं. जो पूजा के कुछ देर बात तक जलता है और फिर बुझ जाता है. दीया जलाने के लिए तेल या गाय के घी का उपयोग करते हैं. उसमें रूई की बाती लगाते हैं. घी के दीपक में गोल और तेल के दीपक में लंबी बाती का इस्तेमाल होता है. अब प्रश्न यह है कि पूजा के बाद दीया कब तक जलना चाहिए? इसके लिए घी या तेल मे से क्या बेहतर होता है? अगर दीया जल्दी बुझ जाए तो इसका क्या संकेत है?
पूजा के बाद दीया कब तक जलने देना चाहिए?

जब आप किसी पूजा के लिए दीया जलाते हैं तो पूजा के संपन्न होने तक उसको जलना चाहिए. पूजा खत्म हो जाए और दीया जल रहा है तो उसे स्वयं फूंक मारकर या हाथ से न बुझाएं. उसे जलने दें. जैसे ही तेल या घी खत्म होगा, वह दीपक स्वयं ही शांत हो जाएगा.

यदि आप कोई शुभ कार्य कर रहे हैं और उसमें आपने दीया जलाया है और वह बीच में बुझ जाए तो लोग उसे अशुभ मानते हैं. लेकिन पूजा पाठ के दौरान आपने दीया जलाया और वह हवा से बुझ जाए, या तेल और बाती में किसी कमी की वजह से दीया बुझ जाए तो परेशान न हों. आप उस देवी या देवता से क्षमा प्रार्थना करें, जिसके लिए पूजा कर रहे हैं और उसके बाद दीया फिर से जला दें.
पूजा के दीए के लिए घी और तेल में से क्या बेहतर माना जाता है?
पूजा में दीया जलाने का महत्व है. आप जो पूजा करते हैं, उसमें दीया के माध्यम से अग्नि को साक्षी माना जाता है. वैस भी दीया अंधकार को दूर कर प्रकाश लाने वाला और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है. सभी लोगों के पास गाय का घी हो, यह संभव नहीं है. सरसों का तेल सभी के पास होता है. ऐसे में आप सरसों के तेल का दीपक जला सकते हैं.
शास्त्रों के अनुसार, घी का दीपक देवी और देवताओं के दाहिने तरफ जलाना चाहिए, जबकि तेल का दीपक उनके बाएं तरफ रखना चाहिए. तेल का दीपक संकटों को दूर करने, ग्रह दोषों से मुक्ति, मनोकामना पूर्ति के लिए जलाते हैं, वहीं घी का दीपक सकारात्मक ऊर्जा, सात्विकता, शुद्धता का प्रतीक है.