अहमदाबाद/नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उस दावे का खंडन किया है। जिसमें यह कहा गया है कि जस्टिस आफताब आलम के उनके आवास पर हस्ताक्षर लेने के लिए पहुंचे थे। अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा है कि आफताब आलम की कृपा से मेरी जमानत याचिका 2 साल तक चली। आमतौर पर यह ज्यादा से ज्यादा जमानत याचिका 11 दिन तक चलती है। एएनआई को दिए इंटरव्यू में जब शाह से पूछा गया कि क्या जस्टिस घर पर दस्तखत लेने आए थे, तो शाह ने कहा कि नहीं, ऐसा नहीं हुआ। आफताब आलम मेरे घर कभी नहीं आए। उन्होंने रविवार को एक विशेष अदालत लगाई और मेरी जमानत याचिका पर सुनवाई की। उन्होंने कहा कि गृह मंत्री होने के नाते अमित शाह सबूतों को प्रभावित करेंगे। इसलिए मेरे वकील ने कहा कि अगर आपको यही डर है, तो जमानत याचिका पर फैसला होने तक हमारे मुवक्किल गुजरात से बाहर रहेंगे।
किसी की बेल एप्लीकेशन दो साल नहीं चली
अमित शाह ने कहा कि मैं दो साल बाहर रहा क्योंकि भारत के इतिहास में किसी की जमानत याचिका कभी दो साल तक नहीं चली। आफताब आलम की कृपा से मेरी जमानत याचिका 2 साल तक चली। ज्यादा से ज्यादा जमानत याचिका 11 दिन तक चलती है। अभी देश के गृह मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे अमित शाह को 25 जुलाई, 2010 को अरेस्ट किया गया था। इसके बाद उन्हें 14 दिन क न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। अमित शाह ने गिरफ्तारी से पहले गुजरात के गृह राज्य मंत्री का पद छोड़ दिया था। करीब तीन महीने बाद अमित शाह को 21 अक्तूबर, 2010 को जमानत मिल गई थी, लेकिन इसके बाद सितंबर, 2012 तक गुजरात से दूर रहने को कह दिया गया था। गुजरात की भाषा में तड़ीपार कर दिया गया था।
क्यों गिरफ्तार हुए थे अमित शाह?
26 नवंबर, 2005 को गुजरात के अहमदबाद में गैंगस्टर सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर हुआ था। सोहराबुद्दीन को पहले आतंकी बताया गया था। बाद में वह गैंगस्टर निकला था। पुलिस के एनकाउंटर पर सवाल खड़े हुए थे। इस एनकाउंटर में सोहराबुद्दीन की पत्नी को मार दिया गया था। इस मामले में अमित शाह को आरोपी बनाया गया था। इसके बाद 25 जुलाई 2010 को अमित यााह की गिरफ्तार किया गया था। 15 साल पुराना यह मामला इसलिए चर्चा में आ गया है क्यों अमित शाह ने 130वां संविधान संशोधन संसद में रखा है। इसमें प्रावधान है कि गिरफ्तारी के अगले तीस दिन अगर मुख्यमंत्री और मंत्री को बेल नही मिलती है तो उसे अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। इस संशोधन को लेकर विपक्ष अमित शाह पर हमलावर है। उसका कहना है कि सरकार यह बिल विपक्ष की सरकारों को टारगेट करने के लिए ला रही है।
कौन हैं आफताब आलम?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जिन पूर्व जस्टिस आफताब आलम का जिक्र किया है। वे बिहार के पटना के रहने वाले हैं। 19 अप्रैल, 1948 को जन्में आफताब आलम 27 जुलाई, 1990 को पटना हाईकोर्ट में जस्टिस बने थे। इसके बाद उनका ट्रांसफर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट हुआ। वह वहां पर कुछ समय तक कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश भी रहे। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट आए। उन्होंने 11 नवंबर, 2007 को कार्यभार ग्रहण किया और फिर 18 अप्रैल, 2013 को रिटायर हुए थे। इस कार्यकाल के दौरान आफताब आलम गुजरात से जुड़े मामलों की सुनवाई की थी। रिटायरमेंट के बाद 1 जुलाई, 2013 को केंद्र सरकार ने जस्टिस आफताब अहमब को टेलीकॉम डिस्प्यूट्स सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्रिब्यूनल (TDSAT) का चेयरमैन बना दिया था। जस्टिस आफताब आलम पर कम्युनल माइंडसेट रखने का आरोप भी लगा था। तब गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व जज एस एम सोनी ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को पत्र लिखकर कहा था कि जस्टिस आफताब आलम को गुजरात के मामलों से हटाया जाए। उन्होंने यह पत्र जुलाई 2012 में लिखा था।
केस में सामने आया था अजीब संयोग
2010 में आफताब आलम जिस बेंच में थे। उसी ने यह आदेश दिया था कि सोहराबुद्दीन शेख फर्जी एनकाउंटर की जांच सीबीआई करे।आमल ने जस्टिस तरुण चटर्जी के साथ यह आदेश सोहराबुद्दीन के भाई रुबादुद्दीन की याचिका पर दिया था। इसे संयोग कहें, नियति कहें या सुप्रीम कोर्ट में दिवाली की छुट्टियों के कारण जजों की अनुपलब्धता थी। तब अमित शाह की जमानत रद्द करने की सीबीआई की अपील की सुनवाई उसी बेंच के सामने आ गई जो सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सीबीआई जांच की निगरानी कर रही है। जस्टिस आफताब आलम और आर एम लोढ़ा की बेंच ने जांच की निगरानी की थी।

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